सुजीत कुमार झा

कखनो–कखनो
भीतर एकटा शून्य जन्म लैत अछि—
स्थिर… गहीर… मौन,
जकाँ किछु अधूरा
अपन प्रतिध्वनि बनि रहल हो ।

ओ शून्य
ओहि अभावक अवशेष अछि,
जकरा हम
आधा जीलहुँ,
आधा छोडि़ देलहुँ ।

ओहि शून्यक आगू
सभटा प्रसन्नता
क्षणिक बुझाइत अछि—
जकाँ मुस्कान
मात्र एकटा आवरण हो ।

अहाँ बिहुँसैत छी,
संवाद करैत छी,
जीवनक लयमे
स्वयंकेँ जोड़ैत छी—
मुदा भीतर
एकटा परत बनल रहैत अछि,
जतए कोनो हलचल
पहुँचि नहि सकैत ।

मानू—
आत्मा स्वयंकेँ
संसारसँ नहि,
अपनहि अनुभूतिसँ
अलग कऽ लेने अछि ।

जीवनक क्षणभंगुरता
आ अस्तित्वक गहराइ
जखन एकसंग
मोनमे उतरैत अछि,
तखन—

एक हिस्सा
बेचैन भऽ उठैत अछि,
आ दोसर—
ओतबे शान्त ।

एहि विरोधमे
शायद
हमर सत्य बसैत अछि—
जतए शून्य
रिक्त नहि,
अपितु

अर्थक आरम्भ होइत अछि ।