♦ सुजीत कुमार झा

समय
धीरे–धीरे बढ़ैत अछि—
सभकेँ अपन संग
लोभाबैत, बहाबैत ।

पुरान साल
हमरा बुझबासँ पहिने
चुपचाप
समाप्त भऽ गेल—
मात्र किछु स्मृति
हाथमे छोडि़ कऽ ।

बीतल वर्ष
फेर चलि गेल,
पाछाँ
अनुभवक चिन्ह छोडि़ कऽ ।

समय—
ओ कखनो रुकैत नहि,
चाहे कतबो
प्रतिस्पर्धा कऽ लिअ,
ओ सदा
आगाँ बढ़ैत रहैत अछि ।

आब—
नव वर्ष आबि गेल अछि,
अपन संग
नव संख्या नहि,
नव संभावना लऽ कऽ ।

ई कामना अछि—
एहि संसारमे
सभ किओ सुखी रहए,
ककरो जीवन
अभावमे नहि बीतए ।

नव वर्ष
हमरा सभकेँ
नव चेतनाक वरदान देत,
आ जीवनमे
नव ऊर्जाक संचार करत ।

आशा—
नव वर्षक सीमा पर
बिहुँसैत ठाढ़ अछि,
धीरे–धीरे कहैत—
‘एहिबेर
समय आओर नीक होएत ।’

बीतल वर्षमे
जे साज–सज्जा
टूटि गेल छल,
एहि वर्ष
ओहि टुकड़ाकेँ जोडि़
एकटा नव सुर देल जाए ।

हे बीतल वर्ष—
अहाँ सीढ़ी छलहुँ,
जाहि पर चढि़ कऽ
हम एतए पहुँचल छी—
एहि लेल
लाख–लाख प्रणाम ।

किए तँ—
अहाँ बिना
ई नव आरम्भ
सम्भव नहि छल ।