सुजीत कुमार झा

सम्पत्ति विवरण खुलल—
कागज पर
देशक नेतृत्व
चमकए लगल अछि ।

नगद, सेयर, घर–जमीन—
सभ अंकित अछि,
मुदा सभसँ बेसी
जे चमकैत अछि,
ओ अछि—
सोन ।

भरि–भरि जोड़ल
ई तथ्यांक
मात्र गहना नहि,
ई सत्ताक स्वादक
मौन गवाही अछि ।

किओ १९० भरि,
किओ १८०,
किओ ८०,
किओ ४५—
संख्या बदलैत अछि,
मुदा चमक
सभमे एक्के रंग अछि ।

देश
जतए
कतेको घरमे
अन्नक कमी अछि,
ओतए
सत्ताक घरमे
सोनक भार
बढ़ैत जाइत अछि ।

ई विरोधाभास
कागज पर नहि,
समाजक आत्मामे
लिखल जाइत अछि ।

हम पूछैत छी—
सोना महँग किएक अछि ?
बाजार कहैत अछि—माँग बढ़ल,
मुदा अनुभव कहैत अछि—
लोभ गहिर भेल ।

किछुए दिनक सत्ता—
आ एतेक संग्रह !
तँ जे वर्षोसँ खेलमे छथि,
हुनकर भण्डार
कतेक गहिर हएत ?

पहिने— सम्पत्ति नुकाओल जाइत छल,
एखन—
घोषणा कएल जाइत अछि,
ई पारदर्शिताक
सकारात्मक शुरुआत अछि—
मुदा
मात्र देखाबा नहि,
उत्तरदायित्व सेहो आवश्यक अछि ।

कागज पर लिखल सोन—
असलमे
एकटा प्रश्न अछि,
जे जनता पढ़ैत अछि,
मुदा उत्तर
किओ नहि दैत अछि ।

एहि लेल—
ई मात्र विवरण नहि,
ई दर्पण अछि—
जतए सत्ता अपन चेहरा देखैत अछि,
आ जनता
अपन अभाव ।