♦ सुजीत कुमार झा

जीवनमे
बहुतो अन्हर–बिहारि आएल,
बाट कहियो साफ नहि छल—
गरदा, काँट,
आ अनिश्चितताक धुन्धसँ भरल ।

तैयो—
हम सड़कपर
चुपचाप चलैत रहलहुँ,
रुकल नहि,
मोड़ पर ठहरल नहि ।

जे लक्ष्य लऽ कऽ
हम आगाँ बढ़ल छलहुँ,
ओ लक्ष्य
एखनो
हमर स्वासमे बसैत अछि—
आ हम
ओकरा छोड़ल नहि अछि ।

काज अधूरा अछि—
मुदा अधूरापन
हमरा हार नहि बुझाइत,
ई तँ
प्रयास जीबैत रहबाक
प्रमाण अछि ।

लोक
अपन–अपन हिसाबसँ
विश्लेषण करैत हएत—
किओ कहत
हारि गेल,
किओ कहत
बाट बिसरा गेल ।

मुदा—
हम जनैत छी,
जे जँ मनुष्यक भीतर
आगि एखनो जरैत अछि,
तँ यात्रा
समाप्त नहि भेल अछि ।

हम
एखनहुँ
ओहि लक्ष्य दिस
चलैत छी—
धीरे,
थाकल,
मुदा अडिग ।

किए तँ—
सही जीत
उचाइ पाबएमे नहि,
ओ तँ
हारक बीचो
चलैत रहबाक
साहसमे बसैत अछि ।

एहि लेल—
हम हारल नहि छी,
हम
एखनहुँ
जीतैत छी ।