सुजीत कुमार झा

पता नहि—
कोन कलमसँ लिखल अछि
भाग्य हमर,
जे जखन–जखन
मुस्कान फूटए लगैत अछि,
तखन–तखन
पीड़ाक एकटा छाया
आगाँ आबि ठाढ़ भऽ जाइत अछि ।

जखन मन
कनि प्रसन्न होबए चाहैत अछि,
तखन किछु अदृश्य हाथ
सुखक दीप
धीरे–धीरे बुझा दैत अछि ।

हम सोचैत छी—
ई संयोग अछि,
मुदा जीवन
बारम्बार दोहराइत अछि
इएह कथा—
जे सुख
क्षणिक अतिथि अछि,
आ दुःख
घरक स्थायी निवासी ।

तैयो—
हम हारैत नहि छी,
किए तँ
जतए पीड़ा आबैत अछि,
ओतए सहनशीलता
अपन जड़ पसारैत अछि ।

शायद—
भाग्य कोनो सजा नहि,
एकटा पाठ अछि,
जे हँस्सीक बीचो
अश्रुक अर्थ
सिखबैत अछि ।

एहि लेल—
आब जखन पीड़ा आबैत अछि,
हम ओकरा शत्रु नहि,
सहयात्री बुझैत छी—

किए तँ
शायद ई कलम
दुःखसँ नहि,
सहनशीलतासँ
हमर कथा लिखि रहल अछि ।