सुजीत कुमार झा

अनुभव कहैत अछि—
टेढ़ बाट मात्र जंगलमे नहि,
समाजमे सेहो बनाओल जाइत अछि,
जतए सत्य
जानिबूझि कऽ
भ्रम बना देल जाइत अछि ।

आ सोझ, सही बाट—
चिकन, समतल सड़क जकाँ,
ओतए
हम बेसी लोककेँ
निश्चिन्त नहि,
अपितु आन्हर बनि
फिसलैत देखलहुँ अछि ।

अनुभव फेर कहैत अछि—
जर्जर झोपड़ीक
छोट–छोट छेदसँ
हवा अबैत अछि,
किए तँ ओतए
स्वास लेबाक अधिकार
एखनो बचल अछि ।

मुदा
बन्द कोठामे—
जतए सभ किछु ‘सुव्यवस्थित’ कहल जाइत अछि,
ओतए
नियम, डर आ चुप्पी
मिलि कऽ
दम घोंटैत अछि—
आ हम
लोककेँ
चुपचाप मरैत देखैत छी ।

जमीनसँ जुड़ल लोक
धीरे–धीरे
हृदय जीतैत अछि,
मुदा
आकाशक नाम पर
सपना बेचएवाला लोक
धरती छीनी लैत अछि ।

आश्चर्य नहि—
जे उड़ेवाला
सभसँ पहिने
अपन जडि़ काटैत अछि,
आ खसला पर
दोष
माटिकेँ दैत अछि ।

बहुत लोक कहैत अछि—
किताबी ज्ञान
सभ किछु सिखा देत,
मुदा ओ किताब
कखनो नहि बतबैत अछि—
जे भूख कोना लगैत अछि,
अन्याय कोना सहैत अछि,
आ चुप्पी
कोना थोपा जाइत अछि ।

अनुभव सिखबैत अछि—
जे जीवनक कठोर यथार्थ
हमरा मात्र मनुष्य नहि,
कखनो–कखनो
विद्रोही सेहो बनबैत अछि ।

एहि लेल—
अनुभव कहैत अछि,
आ बेर–बेर चीत्कार करैत अछि—
जे सीख
जीवनसँ भेटैत अछि,
ओ पुस्तकमे नहि,
संघर्षमे लिखल जाइत अछि ।

आ सत्य—
ओहि पन्नापर लिखल जाइत अछि
जाहि पर
बहुतो लोक
आँखि फेरि लैत अछि ।

आ अन्तमे—
अनुभव ई नहि पूछैत अछि
अहाँ की पढ़लहुँ,
ओ ई पूछैत अछि—
अहाँ कतेक सहलहुँ,

आ कतेक चुप रहलहुँ ।