♥ सुजीत कुमार झा

गंतव्यक प्रतीक्षा नहि करू,
यात्राक आनन्द लिअ—
किए तँ जीवन
ठहरल बिन्दु नहि,
निरन्तर बहैत यात्रा अछि ।

हरेक बितैत क्षणसँ संग
स्वयंकेँ नव बनाबू,
दू समयक बीचक
ओहि सूक्ष्म क्षणमे
जीवनक असल रस बसैत अछि ।

ओहि क्षणकेँ
मात्र काटू नहि—
ओकरा जिअ,
ओकरा
आनन्दक नशामे बदलू ।

हँसैत, गबैत
जीबएकेँ कारण
खोजैत रहू—
किए तँ कारण
बाहर नहि,
भीतर उपजैत अछि ।

बहुत मुस्किलसँ भेटल
ई अमूल्य जीवन—
एहि लेल
ओहि मातापिताकेँ
श्रद्धासँ धन्यवाद दिअ
जे अहाँकेँ
एहि संसारमे आनलन्हि ।

कनैत रहलासँ
किछु नहि बदलैत—
मुदा प्रयास
परिस्थितिकेँ बदलि सकैत अछि ।

एहि लेल—
समयक संग
स्वयंकेँ बढि़या बनाबए लेल
प्रयासरत रहू,
किए तँ
जीवनक असली जीत

सुधारमे बसैत अछि ।