सुजीत कुमार झा

१. मर्यादाक दीप राम

राम—
मात्र नाम नहि,
ओ एकटा मार्ग छथि,
जे मनुष्यकेँ
मनुष्य बनेबाक सीख दैत अछि ।

राम तँ छथि
हमरसभक आदर्श—
कौशल्याक राजदुलारा,
मिथिलाक पाहुन,
जन–जनक हृदयमे बसल
एकटा जीवित विश्वास ।

ओ पुत्र छथि—
जे पिताक वचन लेल
राजसिंहासन त्यागि देलन्हि,
आ वनक कठोर बाट
हँसैत–हँसैत स्वीकार कयलन्हि ।

ओ पति छथि—
जे प्रेममे मर्यादा देखेलन्हि,
आ नारीक सम्मानकेँ
अपन जीवनक केन्द्र बनौलन्हि ।

ओ भाय छथि—
जे लक्ष्मण जकाँ समर्पण
आ भरत जकाँ त्याग
सभ सम्बन्धमे अर्थ भरैत छथि ।

ओ राजा छथि—
जिनकर शासनमे
न्याय मात्र नियम नहि,
मुदा करुणा आ समता
जीवनक आधार बनैत अछि ।

राम—
युद्ध सेहो कयलन्हि,
मुदा विजय लेल नहि,
धर्मक रक्षा लेल ।

ओ शक्ति छथि,
मुदा अहंकार रहित ।
ओ वीर छथि,
मुदा विनम्रतासँ भरल ।

एहि लेल—
राम मात्र भगवान नहि,
ओ एकटा आदर्श छथि—
जे सिखबैत अछि
जे सत्तासँ पैघ
मर्यादा होइत अछि ।

राम हमरसभक पूजा छथि,
हमरसभक विश्वास छथि,
हमरसभक संसार छथि—
आ मनुष्यताक
सभसँ उज्ज्वल उदाहरण छथि ।
…………….

२ आधुनिक समयमे राम

राम—
मूर्ति नहि,
प्रश्न छथि ।

ओ पूछैत छथि—
‘अहाँ अपन जीवनमे
कतेक न्याय राखैत छी ?’

राम तँ छथि
कौशल्याक राजदुलारा,
मिथिलाक पाहुन—
मुदा आइ
ओ मात्र इतिहासमे नहि,
हमर व्यवहारमे
होएबाक चाही ।

जखन
सत्ता हाथमे अबैत अछि—
तखन स्मरण राखू,
राम
राजा होइतहुँ
अहंकार नहि बनलथि ।

जखन
निर्णय कठिन होइत अछि—
तखन बुझू,
राम
सुविधा नहि,
कर्तव्य चुनलन्हि ।

जखन
सम्बन्ध टूटैत अछि—
तखन सोचू,
राम
प्रेमकेँ अधिकार नहि,
मर्यादा बनौलन्हि ।

मुदा—
प्रश्न एतए समाप्त नहि होइत अछि ।

आधुनिक समयमे
रामक नाम
बहुत बेर
नारा बनि जाइत अछि,
मुदा
हुनक आदर्श
भीड़मे हेराइत अछि ।

मन्दिरक संगहि
मनुष्यताक घरो
उजाससँ भरल रहए—
एहीमे पूर्णता अछि ।

रामराज्यक बात होइत अछि,
मुदा
न्याय कतए अछि ?
करुणा कतए अछि ?
समता कतए अछि ?

राम—
ओ शक्ति छथि
जे कमजोरक संग ठाढ़ होइत छथि,
ओ सत्य छथि
जे भीड़सँ नहि डेराइत छथि ।

एहि लेल—
रामकेँ पूजए सँ पहिने
बुझएकेँ प्रयास करू।

किए तँ—
राम
मूर्ति बनि कऽ
मौन रहि सकैत छथि,
मुदा
आदर्श बनि कऽ
चुप नहि रहैत छथि ।

आ अन्तमे—
राम बाहर नहि,
भीतर खोजू—
जतए
अहाँक निर्णय
अहाँक चरित्र बनैत अछि ।

ओतए जँ राम छथि—
तखन
समय कतेको बदलि जाए,
मानवता
कखनो हारत नहि ।