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मैथिली बालकथाः तितलीसंग दोस लगाएब

सुजीत कुमार झा ।


शुक्र दिन भेलाक कारण विद्यार्थीसभ उत्साहित छल । आई फेर भरत सर खिस्सा कहथिन । शुक्र दिन अन्तिम घण्टीमे ५ कक्षाक विद्यार्थीसभके अतिरिक्त विषयक पढ़ाईके नामपर खिस्सा सुनाओल जाइत अछि ।
खिस्सेके कारण मोहनके अपन माँसंगे दू दिनक लेल मामा गाम जएबाक छल, ओ नहि गेल । पहिलबेर माँके अनुपस्थितिमे घरमे रहए पड़लासँ मोहनके दुःख अवश्य लागि रहल अछि मुदा खिस्सा सुनबाक उत्साह दुःखपर भारी अछि ।
खिस्से सुनबाक लेल जुही सर्दीके बादो विद्यालय आएल अछि । भरत सरक ई घण्टी हम कोनो हालतमे नहि छोड़ब सर्दीके विषयमे एकटा साथीद्वारा पुछलापर ओ बाजल ।
समय भेल । भरत सर बिहुँसैत क्लास रुममे पहुँच गेलथि । सभ शान्त छल, आई सर कोन खिस्सा सुनौता, ताहिके लऽ कऽ सभक मोन भितर उत्सुकता छल ।
भरत सर अबिते एकबेर रुमक चारुकात घुमलथि । फेर अप्पन कुर्सीपर आबि बैसि रहलथि ।
साक्षीके शान्त रहल नहि भेल । ओ भरत सरसँ पुछिए लेलीह, ‘सर आई कोन खिस्सा सुनेबै ?’
‘तोहीँसभ आई खिस्सा कहअ ने ?’ भरत सर कनी दीर्घश्वास छोड़ैत बजलाह ।
विद्यार्थीसभ एकर अपेक्षा नहि कएने छल, तएँ सभ एक स्वरमे बाजल, ‘नहि आई फेर अपनहीके सुनाबए पड़त ।’
‘ठीक छैक कहैत भरत सर कुर्सीपरसँ उठि कऽ प्रश्न कएलन्हि, ‘एखनधरि तोँसभ कएटा तितलीके मारने छह ?’
सुधिर ठाड़ भऽ बाजल, ‘सर हम पाँचटा ।’
रोहनके नहि रहल भेलैक ओहो ठाड़ भऽ गेल आ बाजल, ‘सर हम दश…..।’
मुरारी एतेकटा भेलाक बादो एकहिटा तितलीके मारने छल ओकरा भीतर ग्लानी भऽ रहल छलैक, हमहुँ सुनाउ वा चुप्पे रही मुदा ओहो अपनाके नहि रोकि सकल कनीक लजाइते बाजल, ‘सर हम एकहिटा तितलीके मारने छी ।’
ई सुनिते सभ विद्यार्थी हँसए लागल । सभ मुरारी दिस ताकए लागल जेना ओ एकहिटा मारि कऽ कोनो अपराध कएने हुए । छात्र दिस कए गोटे बाजल मुदा छात्रा दिससँ केओ नहि । सर छात्रा दिस मँुह घुमौलन्हि । कहुँ हमरा तऽ नहि बाजए परए सोचैत सभ एकहिबेर मुरी गोँइत लेलक ।
‘की बात छात्रासभ एकहुटा नहि मारने अछि ?’
ओम्हरसँ कोनो प्रतिक्रिया नहि पाबि, भरत सर पिंकीके माथपर हाथ रखैत स्नेहसँ पुछलन्हि, ‘पिंकी तऽ २०टासँ बेसी मारने हएत ?’
पिंकी ठाड़ होइत बजलीह, ‘नहि सर तितलीके पकडि़ कऽ खेलाएल छी मुदा खेलौलाक बाद हमर भाई उड़ा देलक ।’
पिंकीके बैसए कहैत रुचीके नामे धऽ कऽ उठए कहलन्हि, ओ ठाड़ भेल मुदा बाजि नहि रहल छल । भरत सर अपने रुचीलग जा कऽ दू तीन बेर पुछलन्हि तऽ अस्थिरे ओकर स्वर निकलल, ‘हमरा तितली पकड़ही नहि अबैत अछि…।’
रुचीके अपन सीटपर बैसए कहि भरत सर अपना स्थानपर चलि एलाह । फेरसँ सभसँ एकटा प्रश्न कएलन्हि, ‘परशुराम तलाउ कतेक गोटेके बुझल अछि ?’
सरोज ठाड़ होइत बाजल, ‘हमरा सर…।’
‘कतए ?’
‘जनकपुरक गंगा सागर लग…।’
‘नहि गलत जवाब…आओर ककरा बुझल अछि ?’
रागिनी हात उठौलक । भरत सर उठए कहलन्हि एहिपर रागिनी उठि कऽ बाजल, ‘धनुषाधाम रोडमे…।’
‘हँ, ठीक कहलहुँ रागिनी ।’ आब फेरसँ अपना कुर्सीपर बैसैत भरत सर कहलन्हि, ‘तितली, परशुराम तलाउ, बाबाजी आ चोरबला खिस्सा आई कहब ।’
सभ विद्यार्थी उत्सुकतासँ भरल भरत सर दिस ताकए लागल ।
कनी खोँखैत भरत सर खिस्सा कहब शुरु कएलन्हि, ‘ परशुराम तलाउपर एकटा साधु तपस्या कऽ रहल छलथि । ओम्हरसँ किछु चोर जाइत छल । ओ राज्यकोषसँ लुटि कऽ भागि रहल छल । लूटक धन सेहो ओकरासभ संग छल । राजाक पुलिस ओकरा पकड़बाक लेल पाछासँ दोड़ैत आबि रहल छल । चोर लूटक धन साधुक कुट्टीमे नुका कऽ भागि गेल…..।’
एतेक कहलाक बाद भरत सर विद्यार्थीसभ दिस तकलन्हि । हुनका बुझेलन्हि मोहित किछु असहज जकाँ ताकि रहल अछि । एहिपर मोहित लग जा पुछलन्हि, बाबू कथुक चिन्ता ?’
‘नहि सर…..।’
‘कहु ने ….?’
‘सर साधु कथीके कहैत छैक ?’
‘एँ साधु नहि बुझलियैक ?’
ओ मूड़ी गोँइत लेलक । फेर छात्रा दिस प्रश्नवाचक दृष्टिसँ सर तकलन्हि । रम्भा ठाड़ होइत बाजल, ‘जे धोती कुर्ता पहिरने हुए, दाढ़ी रहैक, चानन ठोप कएने रहैक आ रामायण गीताक सदैत पाठ करैत हुए….।’
रम्भाक जबाबसँ सभ विद्यार्थी साधुक विषयमे बुझि गेल । ओ जवाबसँ भरत सर सेहो किछु देरक लेल चकित रहि गेलथि । एतेक कम उमेरमे एतेक सुन्दर जवाब मोनमे एलन्हि । फेर अपन कुर्सीपर बैसैत भरत सर खिस्साके आगा बढौलन्हि, ‘…जखन कुट्टीमे धन नुका कऽ चोरसभ भागल एकर किछुए देरमे पुलिस आएल । चोरके खोजैत–खोजैत ओसभ कुट्टी भीतरमे चलि गेल । चोर तऽ नहि भेटल मुदा ओतए राखल धन अवश्य भेट गेल…. ।’
कनी पानि पीब कऽ फेरसँ भरत सर खिस्साके आगा बढौलथि, ‘…… पुलिससभ सोचलक बाहरमे बैसल व्यक्तिए चोर अछि । स्वयंके बचाबएके लेल साधुके भेष बना लेने अछि । तपस्याक नाटक कऽ रहल अछि । ओसभ साधुके पकडि़ लेलक आ राजा लग जा प्रस्तुत कएलक । राजा सेहो किछु विचार नहि कएलन्हि आ नहि पकड़ल गेल अभियुक्तके किछु पुछलन्हि । ओ फाँसीके सजाय सुना देलन्हि…. ।’
एतेक कहैत भरत सरके लागल विद्यार्थीसभ फाँसी बुझैत अछि कि नहि से जाँचल जाए । ‘फाँसी कतेक गोटेके बुझल अछि ?’ विद्यार्थी दिस तकैत प्रश्न कएलन्हि ।
१०÷१२टा विद्यार्थी एकहि बेर हात उठा लेलक । कि सभ बुझैत अछि सोचैत हात उठाबएबलामेसँ सुमितके कहलन्हि, ‘फाँसी कि होइत छैक ?’
‘मुँहमे कारी पट्टी बान्हि कऽ कण्ठमे डोरी लगा कऽ मारि देल जाइत छैक….सुमित बाजिए रहल छल कि मुकेश ठाड़ होइत बाजल, ‘…सर हम क्रान्तिविर हिन्दी फिल्ममे फाँसी देखने छियैक…..।’
सरके बुझाएल छात्रा दिससँ सेहो केओ किछु बाजए चाहैत अछि । ओ ओम्हर तकिते छलैथ कि रुना बैसले–बैसले बाजल, ‘सर हमर मामा गाममे एक गोटेके फाँसी लागल छैक ।’
भरत सर रुना दिस तकैत बजलाह, ‘किनका फाँसी भेल छैक ?’
‘सर जटहीके दुर्गानन्द झाके फाँसी नहि देल गेल छैक,’ ठाड़ होइत रुना बाजल ।
भरत सर ओकरा बैसए कहैत अपने ठाड़ भेलाह आ कहलाह, ‘अहाँसभके फाँसीबला बात बहुत बँढिया जकाँ बुझल अछि । सहीमे रुना कहलन्हि अछि राजा महेन्द्रपर बम फेकलाक बाद दुर्गानन्द झाकबे फाँसी देल गेल छल…. दुर्गानन्द झा प्रजातान्त्रिक आन्दोलनके बहुत बड़का योद्धा छलाह ।’
फेरसँ भरत सर अपन कुर्सीपर बैसैत खिस्साके आगा बढौलन्हि । ‘….राजाद्वारा फाँसीक सजाय सुनेलाक बाद साधु मोनेमन विचार करए लगलाह किए एना भेल ? ई हुनका कोन पापक सजाय भेटि रहल अछि । ओ अपन जीवनक अवलोकन कएलन्हि, कतहुँ किछु नहि भेटल । फेर विगत जीवनक अवलोकन कएलन्हि । देखिते–देखिते सयजन्म देखि लेलन्हि, मुदा कतहुँ किछु नहि देखाई देलक जकर परिणाम स्वरुप एहन दण्ड सुनाई देत ।
आब ओ परमात्माक शरण लेलन्हि । आदेश भेल, साधुके अपन एक सय एकम जन्म देखि ।
साधु देखलन्हि, एक नौ दश बर्षक बालक अछि ओ एक हातमे कोनो किरा रखने अछि आ दोसर हातसँ कोनो सूइया गड़ा रहल अछि । सूइयासँ किरा छटपटा रहल अछि आ बालक कुदि–कुदि कऽ खेला रहल अछि । साधु बुझि गेलाह हुनका कोन पापक दण्ड देल जा रहल अछि ।
मुदा ओ तऽ तपस्वी छलाह कि हुनकर तपस्या सेहो हुनकर ओहि पापके नष्ट नहि कऽ पाएल छल । साधु विचार कइए रहल छलाह कि किछु व्यक्ति जे साधुके जनैत छल ओ राजा लग पहुँच साधु निर्दोष रहल बतौलन्हि । राजा साधुसँ क्षमा मँगैत मुक्त कऽ देलन्हि ।
एतबी देरमे कि कि नहि घटि गेल छल । भगवानक न्याय कतेक निश्पक्ष होइत अछि, कतेक सुक्ष्म अछि एकरा तऽ साधुए बुझि रहल छलाह । मोनेमन ओहि किरासँ क्षमा याचना करैत ओ पुनः परशुराम तलाउपर चलि गेलाह । तपस्याके निरन्तरता देबाक रहन्हि ।
खिस्सा भरत सर लगातार कहि रहल छलथि । विद्यार्थी दिस तकलन्हि कए गोटेके तितलीके मारलापर पश्चाताप भऽ रहल छल ।
एकटा विद्यार्थी ठाड़ भऽ कऽ जिज्ञासा रखलक, ‘सर हमहुँ एकटा तितली मारने छी, हमरो दण्ड भेटतैक ?’
भरत सर कुर्सीपरसँ उठैत कहलन्हि, ‘ई खिस्सा सुनलाक बादो मारैत रहब तऽ अहुँसभके दण्ड भेटत…. आ नहि मारब तऽ भगवान सभके माफ कऽ देताह । ’
आशा हात उठबैत बजलीह, ‘सर तितलीसंग खेलबै मात्रे तऽ ?’
‘खाली खेलाएब, ओकरा कोनो कष्ट नहि देबैक तऽ किछु नहि हएत,’ सर बजला ।
छुट्टीक घण्टी लागि गेल छल विद्यार्थीसभ सरक पाछु–पाछु बिहुँसैत अपन कक्षासँ निकलल आ घर दिस विदा भऽ गेल । बाटभरि तितलीएके चर्चा छल । एकटा विद्यार्थी बाजल, एहिसँ पहिने तितली मारि पाप करैत छलहुँ…..दोसर बाजल, आई बहुत बड़का ज्ञान भेटल….तेसर बाजल, नहि बाबा, आब नहि मारब ओकरासंग दोस लगाएब ।
दोस लगाबएके विषयमे सभक मौन स्वीकृति देखल गेल । एकरबाद सभ विद्यार्थी अपन– अपन घर चलि गेल ।

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