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मिथिलामे होरीक आकर्षण

सुजीत कुमार झा


ऋतुसभक राजा ‘वसंत’मे मनाओल जाएबला होरी मिथिलांचलक महत्वपूर्ण पावनि अछि । वसंत ऋतु शीत ऋतुके बाद अबैत अछि । मिथिलांचलमे होरी फागुन महिनाक पूर्णिमाक एक दिनक बाद मनाओल जाइत अछि । रंगक उत्सव कहल जाएबला ई पावनि पारम्परिक रूपसँ दू दिन मनाओल जाइत अछि । पहिल दिन होलिका दहन कएल जाइत अछि तऽ दोसर दिन एक दोसरके रंग अबिर लगबैत होली खेलल जाइत अछि । सभ राग द्वेश आ कटुताके बिसरि घर घरमे जा कऽ लोक रंग अबिरक बर्षा करैत होरी मनाओल करैत अछि । तएँ तऽ एहि पावनिके मुख्य सन्देश स्नेह आ भाईचारा अछि ।
राग आ रंग होरी पावनिके मूख्य अंग अछि । राग अर्थात संगीत । फागुन महिनामे मनाओल जाएबला एहि पावनिके फागु वा फाल्गुनी सेहो कहल जाइत अछि । होरी पावनि वसंत पञ्चमीके दिनसँ शुरु भऽ जाइत अछि । ओही दिन पहिलबेर रंग अबिर उडाओल जाइत अछि । एहि दिनसँ मिथिलाञ्चलमे होरीके रौनकता बढाबएबला जोगिरा सेहो गाओल जाइत अछि ।


वैदिक आ पौराणिक महत्व
होरी मनाबएके विभिन्न वैदिक आ पौराणिक मतसभ अछि । वैदिक कालमे एहि पावनिके ‘नवान्नेष्टि’ कहल जाइत छल । एहि दिन खेतक अधखिच्चु अन्नक पकवान बना कऽ हवन करैत प्रसाद बाँटएके विधान अछि । एहि अन्नके होला कहल जाइत अछि । तएँ एहिके होलिकोत्सवके रूपमे मनाओल जाइत अछि । किछु गोटे एहि पावनिके अग्निदेवक पूजन मात्र मानैत छथि । मनुक जन्म सेहो इएह दिन भेल मानल जाइत अछि । तएँ एहि दिनके मन्वादि तिथि सेहो कहल जाइत अछि । पुराणसभक अनुसार भगवान शंकर अपन क्रोधाग्निसँ कामदेवके भस्म कऽ देने छलथि, तहिएसँ ई पावनि मनाओल जाए लागल ।


भक्त प्रह्लादके जराबए गेल होलिकासँ सेहो ई पावनिके जोडल जाइत अछि । होलिकाके अग्नीमे नहि जरएके वरदान छल । अपन इएह शक्तिके दुरुपयोग करैत ओ अपन भतिजा प्रह्लादके अग्नीमे भस्म करबाक लेल हुनका संग आगिमे बैसि गेलीह । मुदा होलिका स्वयं एहिमे भष्म भऽ गेल छलीह ।
होरीक कथा
होली पावनिसँ बहुतो कथा जुडल अछि । एहिमे सभसँ प्रसिद्ध कथा भक्त प्रह्लादक अछि । कहल जाइत अछि जे प्राचीन कालमे हिरण्यकशिपु नामक एकटा अत्यन्त बलशाली असुर छल । ओ अपन बलके घमण्डमे अपनाके स्वयं भगवान मानैत छल । ओ अपना राज्यमे भगवान नाम उच्चारण करएधरि पर प्रतिबन्ध लगा देने छल । हिरण्यकशिपुक बेटा प्रह्लाद भगवान विष्णुक परम भक्त छल । प्रह्लादक ईश्वर भक्तिसँ क्रुद्ध भऽ कऽ हिरण्यकशिपु हुनका अनेक प्रकारक कठोर दण्ड देलक मुदा ओ भगवानक भक्तिक मार्ग नहि छोडलन्हि । हिरण्यकशिपुक बहिन होलिकाके वरदान प्राप्त छल जे ओ आगिमे भस्म नहि भऽ सकैत अछि । हिरण्यकशिपु आदेश देलन्हि जे होलिका प्रह्लादके गोदीमे लऽ कऽ आगिमे बैसि जाए । आगिमे बैसलाबाद ओ स्वयं भष्म भऽ गेलीह आ प्रह्लादके किछु नहि भेल । ईश्वर भक्त प्रह्लादके स्मरणमे होलिका दहन कएल जाइत अछि तऽ होली पावनि मनाओल जाइत अछि ।
प्रह्लादक कथाक अतिरिक्त ई पावनि राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्णक रास आ कामदेवक पुनर्जन्मसँ सेहो जुडल अछि ।
ऐतिहासिक रूपमे होरी
राग आ रंगक ई लोकप्रिय पावनि वसंतक सन्देश वाहक सेहो अछि । तएँ एहि पावनिके ‘बसंतोत्सव’ आ ‘काममहोत्सव’ सेहो कहल जाइत अछि ।


इतिहासकारसभ एना मानैत छथि जे आर्यसभमे सेहो एहि पावनिके प्रचलन छल । ‘नारद पुराण’ आ ‘भविष्य पुराण’मे सेहो एहि पावनिके सम्बन्धमे उल्लेख कएल गेल अछि ।
मुगÞल कालमे अकबर आ जोधाबाई एकहि संग तथा जहाँगीर नूरजहाँ संग होरी खेल्ने इतिहास सेहो अछि ।
साहित्यिक रूप में होरी
प्राचीन कालक संस्कृत साहित्यमे होलीक अनेक रूपके विस्तृत वर्णन अछि । श्रीमद्भागवत महापुराणमे रसक समुह रासक वर्णन अछि । भगवान कृष्णक लीलासभमे सेहो होरीक वर्णन मिलैत अछि । अन्य रचनासभमे ‘रंग’ नामक उत्सवके वर्णन अछि । हर्षक प्रियदर्शिका आ रत्नावली तथा कालिदासक कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम्मे सेहो उल्लेख अछि ।


कालिदास रचित ऋतुसंहारमे पूरा एकटा सर्ग ‘वसन्तोत्सव’ के अर्पित अछि । भारवि, माघ आ अन्य कयोँ संस्कृतक कवि वसन्तक बहुत चर्चा कएने छथि ।
आदिकालीन कवि विद्यापतिसँ लऽ कऽ भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर आदि अनेक कविसभके होली पर रचना करब प्रिय छल ।
देवतासभक होरी
राधा कृष्णक होरी


राधाकृष्णक होरीके रंगे किछु आओर अछि । ब्रजके होरीक रंग विश्वप्रसिद्ध अछि । भगवान कृष्ण राधा संग मात्र नहि अन्य गोपीनी संग हुनकाद्वारा खेलल गेल होलीके विषयमे धर्मग्रन्थसभमे उल्लेख अछि ।
राम सीताक होरी
भगवान राम आ सीता पहिलबेर कञ्चनवनमे चारु भाई आ बहिनसंग होरी खेल्ने विभिन्न कथासभमे उल्लेख रहल अछि । भगवान राम अयोध्यामे सेहो सीताजीसंग होली खेलल करैत छलथि । जाहि समयमे ओ दुनू गोटे होरी खेलैत छलाह ओहि समयमे आकाशसँ देवतासभ रंगक बर्षा करैत छलाह ।
खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुधन, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी ।
छिरकत जुगल समाज परस्पर, मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी ।
बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोलि ढप, गृहट गह भये चहुँ ओरी, नवसात संजोरी ।
साधव देव भये, सुमन सुर बरसे, जय जय मचे चहुँ ओरी, मिथलापुर खोरी ।
उमा महेश्वरक होली
भगवान शंकर उमा पार्वती संग होरी खेल्ने विभिन्न पुराणमे उल्लेख अछि । भगवान शंकरके संग भूत प्रेत आदि सेहो होरी खेलल करैत अछि ।
जनकपुरक होरी सेहो कम नहि
जनकपुरमे एकर अलगे प्रभाव अछि । हरेक संघ संस्था कोनो नहि कोनो रुपसँ एहिसँ जुडल कार्यसभ करैत अछि । रंग अबीर आ होरैया गान एकर प्रमुख आकर्षण होइत अछि । आब भांग आ मलपुवा सेहो कार्यक्रमसभक आकर्षण बनए लागल अछि । छठिके बाद सभसँ उत्साहक संग ई पावनि जनकपुरमे मनाओल जाइत अछि । विद्यार्थीसभ सेहो बहुत उत्साहक संग अपन अपन विद्यालयमे ई पावनि मनबैत छथि ।
जनकपुरमे व्यङ्गयात्मक कार्यक्रम सेहो मनाओल जाए लागल अछि । महामुर्ख सम्मेलनके महिनोसँ लोक प्रतिक्षा करैत रहैत अछि ।
होलीका दहनसँ भविष्यवाणी
प्राचीन समयमे होली पावनिके पूर्व सन्ध्यामे होलिका दहनके बाद उठएबला हुए धुवाँ देखि कऽ भविष्यवाणी कएल जाइत छल । यदि होलिका दहनसँ उठएबला धुवाँ पूर्व दिशा दिस जाइत अछि तऽ राज्य, राजा आ प्रजाक लेल सुख सम्पन्नताक कारक मानल जाइत छल । यदि होलिकाक धुवाँ दक्षिण दिशा दिस जाइत छल तऽ राज्य, राजा आ प्रजाक लेल संकटक संकेत मानल जाइत छल । यदि होलीकाक धुवाँ पश्चिम दिशा दिस जाइत छल तऽ राज्यमे अन्नक कमी आ अकालक संकेत मानल जाइत छल ।

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