मैथिली कथाः अलग चुल्हा

Byदूधमती साप्ताहिक

१६ आश्विन २०७७, शुक्रबार १३:०४ १६ आश्विन २०७७, शुक्रबार १३:०४ १६ आश्विन २०७७, शुक्रबार १३:०४ ,

कञ्चना झा
जाड़क दिन कोना बीत जाइत अछि, बुझबामे नहि आबैत अछि । अहुँमे अगहन पुसक मास मुदा आजुक दिन पहाड़सन लागि रहल अछि । भानस भात आ बरतन बासन खतम कएलाकबाद लक्ष्मी असोरापर बैसि गेली । दलान जे कि अंगनासँ सटले अछि ओहिठाम घरक पुरुखसभक बैसार जारिए छल आ गहमागहमी चलि रहल अछि । लक्ष्मीक आँखिसँ बड़का–बड़का मोती जँका नोर झहैरि रहल अछि । आँचर पूरा भिज गेल सन बुझा रहल छल मुदा आँखिमे कतेक पानि होइत अछि अनुमान लगाएव कठीन छल, बहनाइ रुकएके नामे नहि लऽ रहल छल । लक्ष्मी कहियो नहि चाहैत छलीह जे हुनका जिबैत घरके बटबारा होईक मुदा आइ बैसार अछि, घरके बटबारा हएबे करतैक ।
माँ माँ रुक्मिणी बहुरियाके आवाजसँ हुनक ध्यान टुटल । एना किए उदास छथि अरे वा हिनकर आँखिसँ नोर खसि रहल अछि, रुक्मिणी बहुरिया लगातार बाजि रहल छलीह ।
लक्ष्मी दिससँ कोनो प्रतिक्रिया नहि । फेर रुक्मिणी बजलीह, – ई तऽ हेबहीक छल एहिके लेल किए कानैत छथि…. ? ओ हुनका लग बैसि रहलीह, सभदिन की सभ संगे रहत ? बहुरिया कनी आबाजपर जोड़ दैत बजलीह ।
हमरा जीबैत ई बटबारा नहि होइत तऽ नीक… लक्ष्मीक मुहँस निकलल ।
दलान पर घरक सभ पुरुख छथि आ फैसला कऽ रहल छथि जे आई रातिसँ सभकिओ अप्पन भानसा अलग बनेतीह । दलान परके बात घरके असोरा तक सुना रहल अछि आ लक्ष्मी अप्पन धैरजके रोकने छथि । ई ओहे दलान आ अंगना अछि जाहिमे कहियो ओ नव कनियाँ बनि आयल रहथि । अपने हाथे एहि घरके सँजौने छलीह । लक्ष्मी हुनक नैहरके नाम नहि छल हुनक साउसक देल नाम छल । नामकऽ संगहि हुनका बहुत पैघ जिम्मेदारी सेहो सौंपल गेल छल – घरके घर बनाकऽ राखएके । ओ एसगरे एतेक बड़का परिवारके सम्भारि लेलीह । लक्ष्मीके आश्चर्य लागि रहल अछि जे आइ एतेक कनिया बहुरिया,पढ़ल लिखल सभकिछु होइतहुँ घरके बँटबारा होमय दऽ रहल छथि । आ लक्ष्मी सेहो किछु नहि कऽ पाबि रहल छथि ।
माँ दलान पर गप्प भऽ रहल अछि जे आई राइतसँ चुल्हा अलग भऽ जेत,ै रुक्मिणी बहुरिया बजलीह ।
जहन लक्ष्मी सुनलीह जे आई राइत सँ चुल्हा अलग होयत तऽ अचाञ्चकमे ध्यान आयल की किनको नैहरसँ बरतन बासन भेटल अछि तऽ कियो अप्पने पैसा कौड़ीसँ बरतन बासन किनने अछि । मुदा राधोपुर वाली दीदीके अवस्था तऽ बहुत नीक नहि अछि । हुनका तऽ सभ संगे अछि तऽ नीक अछि । हुनका लगऽ बरतन बासन सेहो बहुत बेसी नहि अछि । आइ राइत ओ केना भानस करतीह ? कमलपुर वाली कनियाके बच्चा सभ छोट अछि । ओकरा सभके छोडि़ ओ केना भनसा भात करतै ? ओकर धिया पुता तऽ भुखल रहि जएतैक । केना सभके मोन मानत एक घरमे किछु लोक खेताह आ किछु भुखल रहत । गे दाई ई अन्याय हम कोना होमए देबैक ? कि एतबेमे कमलपुरवाली कनिया असोरा पर आबि बाजल – काकी कहाँदन आइ राइतेसँ सभकियो अलग चुल्हा करत ?
हँ हमहुँ सुनैत छी लक्ष्मी बजलीह आ चुप भऽ गेलीह । तकराबाद कमलपुरवाली कि बजलीह से लक्ष्मी नहि सुनलखिन । हुनक ज्ञयान हेरा गेल जेना ।
लक्ष्मीके लागि रहल अछि जेना कियो हुनक हाथ बांधि देने अछि कि ओ एतेक लाचार भऽ गेल छथि कि ततबेमे आंगनमे बैसल आ जोरसँ बाजैत अप्पन दियादनी आ पुतौह सभके बात पर ध्यान गेल – जे नीक भेल कहुँ तऽ एकहिटाके जुइत सभ दिन चलत ? मानलहुँ जे ओ बड़ा बुधियार छथि मुदा आबक लोक की कोनो कम अछि ? सभक जिनगी अछि । सभक अप्पने मोन मुताबिक जिबाक ईच्छा होइत अछि । बटबारा जरुरी छल ।
एकटा बैसार दलान पर तऽ दोसर आंगनमे सेहो भऽ रहल अछि । आब सभ अलग होमए चाहैत छथि । सभके अप्पन अलग दुनिया अछि । घरके बांकी सदस्यक लेल ई बहुत सामान्य बात अछि किए तऽ ओ सभ मात्र आ मात्र अप्पना लेल सोचि रहल छथि । मुदा लक्ष्मीके लेल ई मात्र घर नहि ओकर हृदयक मन्दिर अछि । जँ इ बँटबारा भेल तऽ लक्ष्मीक हृदयक टुकड़ा होएत आ ओ बिखरि कऽ रहि जेतीह । हुनका बटबारा मंजूर नहि आ घरके आन सदस्यक संगे रहनाई सेहो असम्भव । अप्पन हाथे सिंचल बनाएल घरके किओ कोनो बटबारा होइत देखि सकैत अछि । एहि घर अंगनाक लेल तऽ ओ कहिओ अपना पर ध्यान नहि देलन्हि ।
लक्ष्मीक दहोबहो नोर देखि छोटकी दियादिनी बीचमे बजलीह, –बहिन हमर हिनकर बातके सुनत ? होमय देथुन जे भऽ रहल अछि । आब हिनका रोकने नहि रुकत ई बटबारा ।
हँ जोर श्वास लैत लक्ष्मी बजलीह, – हँ तहिना बुझा रहल अछि । हमरा रोकने आब नहि रुकत ।
लक्ष्मीके बुझा गेल जे सभके इएह विचार अछि । कियो पैघ परिवारके जिम्मेदारी लेबाक लेल तैयार नहि अछि मुदा ओ तऽ एसगरे एतेक बड़का परिवारके थामने छलीह । घरमे आरो सदस्य सभ छलखिन मुदा लक्ष्मी तऽ लक्ष्मी छलीह आ हुनकर कोनो जोर नहि छल । पहिनका जमाना छल बहुत कम उमर छल आ विवाह भऽ गेल बड़कीटा के परिवारमे । लक्ष्मी जेहन नाम देलखिन साउस तेहने हर काजमे लक्ष्मीसन रहलीह । बड़ा ध्यान आ मोनसँ अपन गृहस्थीके बैसोलन्हि । घरक सभ सदस्यके मोन हरखित रहन्हि लक्ष्मीके व्यहार सँ । बड़कीटा के परिवारमे बहुतरास तरहक लोकके मोन जितएमे ओ दक्ष छलीह । सभके संगे लऽकऽ चलै वाली लक्ष्मीके आई की भेल ?
ओ चुप्प भऽ बैसल छथि कि ततबेमे सुदर्शनके बोली सुनैत छथि –दाई दाई भुख लागल अछि ,लक्ष्मी किछु कहती की ओहिसँ पहिने ओकर माए आबि ओकरा पकडि़के लऽ गेल अपना संगे आ बाजैत गेल जे आब दाईके तंग नहि करऽ । चल हम दैत छियौ जाहि पर सुदर्शन जोर केलक जे हम दाईके कहबै । ताहिपर ओकर माए मारलक एक थापड़ । सुदर्शन जोर सँ कानल आ कहलक –तोरा बुझल छौ हमरा की नीक लगैत अछि ?
हरेक धियापुताके हरेक पसंद लक्ष्मीके बुझल छल । किए तऽ भनसाघरके जिम्मेदारी हुनका देल गेल छल जाहिमे ओ कोनो कोताहि नहि केने छलीह । ककरा कोन खेनाई नहि नीक लागैत ? वा किनका की खराबी करत ?सभके पसंद नहि पसंद सभटा हुनका बुझल अछि । एतएधरि की बच्चाके माएसँ बेसी हुनका बुझल रहैत अछि । अप्पना संगे घरके हरेक सदस्यके संग हुनक प्रेम अनुपम छल । ओ कहिओ अप्पन आ आन नहि बुझलखिन । हुनका लेल सभ बराबर । किनको नैहरिसँ पाहुन आबथि लक्ष्मी हुनकर स्वागतमे जुटि जायत छलीह जी जानसँ । मुदा समयक संगे संगे सभकिछु बदलि रहल छल । आब हुनको धिया पुता बड़का भऽ गेल । घरमे नवकनिया सभ आबै लगलीह । अप्पन बेटा पुतहु संगे पितियौत पुतहुँ सभके सेहो स्वागत करैत चलि गेलीह लक्ष्मी । अवस्था सेहो भऽ गेल तऽ धीरे धीरे ओ कमजोर सेहो होमए लगलीह आ घरके काजमे हुनक सहभागिता कम होमए लागल । नव कनिया सभ चाहैत छलीह जे लक्ष्मीके स्थान ली मुदा हुनकासन करेज कहाँ छल ? हुनकासन सहनशिलता नहि छल । दुटा काज बेसी करै पड़ल नहि की रुसा फूली शुरु । एक दोसरसँ गारी गलोज सेहो । लक्ष्मी अप्पन तरीकासँ सभके मिला लैत छलीह मुदा आब नहि कऽ सकतहि ।
आब सभके पाहुन अलग अलग आबैत अछि । आब अप्पन पाहुन पर अप्पन ध्यान राखल जाइत अछि । आ जँ कहियो पुरान पाहुन आयल कि बस पाहुनके स्वागत करैके बदलामे सभ एक दोसरके बाट जोहैत रहैत अछि जे – भानस भात के करत ? लक्ष्मीके शरीर जबाब दऽ देने छल ओ सक्षम नहि रहलीह । ओना तऽ बहुतो बेर बटाबराके बात आएल छल लक्ष्मी हरबेर किछु न किछु जुगत लगा मना लैत छलीह सभके । मुदा एहिबेर नहि बचा सकतीह अप्पन परिवारके । अप्पन पुतहुँ आ दियादिनी सभके एहि शीत आ वाक युद्धके ओ नहि दबा सकलीह तऽ आइ मानि लेलनि एहि बटबाराके ।
दलान परसँ पुरुख सभक आबएके आवाज आयल । ताबैतमे लक्ष्मी आजुक राइतके फैसला मोनमे कऽ लेलनि आ ठाड़ भऽ गेलीह । हुनक दिमागमे राधोपुर वाली दीदी आ कमलपुरवाली कनियाँके चेहरा घूमि रहल छल कि सभ पुरुख अंगनामे आबि गेलाह आ कहलाह जे आइसँ सभकियोके चुल्हा अलग भऽ गेल । राइतसँ अप्पन भानस भात अप्पनहि करै पड़त । पुरुख सभ बाजैत रहलाह की लक्ष्मी झटसँ कहलीह आइ राइत सभकियो संगे भानस करतीह आ सभ एकहि संगहि भोजन करत । काल्हि भोरसँ जकरा जेना हेतैक ओ ओना अप्पन ओरियान करत ई बात कहैत ओ विदा भेलीह भनसाघर दिस । सभकिओ अवाक रहि गेल ।

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