सुजीत कुमार झा
कहीं देखा हैं तुमने उसे
जो मुझे सताया करता था
जब भी उदास होती थी मैं
मुझे हँसाया करता था
एक प्यार भरा रिश्ता था वो मेरा
जो मुझे अब भी याद आता हैं
खो गया वक्त के भँवर में कहीं
जो हर पल मेरे साथ होता था
आज एक अजनबी की तरह हाथ मिलाता हैं
जो छोटी से छोटी बात मुझे बताया करता था
कहीं मिले वो किसी मोड़ पर
तो उसे मेरा संदेशा देना
कोई हैं जो आज भी उसका इंतजार कर रहा हैं
जिसे वो मेरा सच्चा साथी बोला करता था
ई कविताक अर्थ कतेक मिलल कहि नहि सकैत छी मुदा हमर एकटा अंग टुटि गेल जकाँ लगैत अछि । हमर मित्र सोहन ठाकुर ई संसार छोडि देलन्हि । कतए रुसिकऽ चलि गेला पत्ता नहि ।


आई भोरेसँ हमर मोबोइलमे फोन अबितेके अबिते अछि । सभ सोहनेजी दिया पुछि रहल छथि । बहुतोके विश्वास नहि भऽ रहल अछि कोना एहि संसारसँ रुसिकऽ चलि गेलाह । कोनो काज करएमे मन नहि लगैत अछि । कखनो होइत अछि । कतहुँसँ आबिकऽ कहिरहल होथि हम तऽ अहीठाम छलहुँ कोना नहि अहाँके भेटि रहल छी ।
सोहनजीसँ पहिल भेट कहिआ भेल छल स्मरण नहि अबैत अछि । मुदा इहो सत्य अछि करीब २५ वर्षसँ हुनकासंग मित्रता अछि । ओहो सामाजिक संघसंस्थामे सक्रिय भेल रहथि आ हम पत्रकारिता शुरु कएने रही ।
तहिआ राम युवा कमिटीक पदाधिकारीके बहुत सम्मानसँ देखल जाइत छल । सामाजिक काजमे जनकपुरधामक किछु युवा क्लव सक्रिय छल ताहिमे राम युवा कमिटी अग्रणी छल । सोहनजी बहुत व्यवहार कुशल छला । एकबेर हुनकासँ भेट भऽ गेल एकरबाद मित्रता एहन होइत छल जे टुटएके नामे नहि ।
हम बजार दिससँ घर अबैत छलहुँ वा घरसँ बजार दिस जाइत छलहुँ प्रायः महाबीर चौकपर भेटिए जाइत छलाह । कनिकोकाल लेल हुनकासंग बातचित भइए जाइत छल । घरसँ दीपनारायण साहक पत्रिका दोकानधरि जाएकाल मात्र ओहे चिन्हैत छलाह लगैत छल । कए दिन एहन होइत छल दिनमे तीनचारिवेर सेहो भेटैत छलाह । कारण राम युवा कमिटीक अतिरिक्त रेडक्रस लगायत कएटा संस्थामे छलथि । कहिओ सरसफाईमे, कहिओ रक्तदान त अन्य कार्यक्रमसभमे सेहो । सभमे हुनक सक्रियता देखए लायक छल ।
पूजापाठमे सेहो पहिचान
पूजापाठमे बहुत सक्रिय रहैत छलथि । राम मन्दिर आ जानकी मन्दिरमे होबएवला कोनो कार्यक्रम होइक सोहनसभसँ आगा रहथि छलथि । कोना विवाहपञ्चमी बढिया जकाँ सम्पन्न हेतैक एक महिना पहिनेसँ लागल रहथि छलथि । पूजामे ओतबे सक्रिय, मन्दिरमे आवएवला अतिथिके स्वागतमे ओतबे सक्रिय फेर जानकी मन्दिरक लेल मात्र नहि राम मन्दिरक लेल ओतबे । फेर मन्दिरसभ दिससँ ओहने सम्मान हुनका देल जाइत छल ।


एकबेर राममन्दिरमे सोहनजी संगे गेल रही मन्दिरक महन्थ राम गिरि कहलन्हि मन्दिरमे आबएवला साधुसन्तसभक लेल तरकारी नहि अछि । ई सुनिते बेटाके कहिकऽ एक झोडा तरकारी अनवा देलन्हि । एकरबाद निरन्तर तरकारी आ तेल ओहे किनकऽ मन्दिरमे उपलब्ध करबैत छलथि । सोहनक आर्थिक स्थिति हमरा बुझल छल । कएदिन हम टोकिओ दैत छलियैन्हि अहाँके अपना लेल तरकारीए नहि आ मन्दिरके लेल तरकारी ? एहिपर ओ कहैत छलथि ठाकुरेजीक प्रतापसँ सभ किछु होइत छैक । विना पूजा कएने भोजन नहि करब नित्य हुनक बाणी छल ।
हमर आ सोहनक जोडी
जखन रेडियो मिथिला छोडि देने रही । स्थानीय कोनो मिडिया नहि छल । कनिक दिन लेल जनकपुर टिभिमे सेहो गेल रही । मुदा ओतहुँ छोडि देलहुँ । तखन एकटा अपन पत्रिका निकालल जाए सोहनक योजना छल । सोहन आ शम्भु साह प्रेमी एकदम जोड लगौलन्हि । किछु आओर मित्रक सेहो जोड छल । एकरबाद दूधमती साप्ताहिक निकलल । पत्रिकाक समाचार लेखनक हमर मात्र काज होइत छल । पत्रिकाक दोकानमे कोना पहुँचतैक, प्रेससँ कोना एतैक सभ व्यवस्थापन ओ आ हरिनारायण व्यारजी करैत छलाह । कतेक कार्यक्रममे हम दुनू गोटे संगे रहति छलहुँ । दूधमतीक ओ सल्लाहकार सम्पादक सेहो छलाह । एभि न्यूजमे हम सयौ अन्तवार्ता लेलहुँ क्यामरा ओहे चलबैत छलाह । क्यामरा खिचएवापत एभिन्यूज कहिओ पैसा नहि देलक, ओकरा पत्तो नहि हएतैक । नामो नहि एकरवादो ओ संगे रहति छलाह । कतेक समाचारमे हम नहि गएलहुँ तऽ हुनके पठा दैत छलहुँ । ऐ दोस्ती हम न तोडेगें…. बेर बेर ओ कहैत छलाह । जखन हुनक बात स्मरण अबैत अछि मन केना केना भऽ जाइत अछि

बहुत याद आता है तू,
हर वक़्त बहुत याद आता है तू,
बहुत सताती है तेरी याद मुझे,
बहुत रुलाती है तेरी याद मुझे,
नहीं भूली हूं तेरी नटखट नादानियों को,
नहीं भूली हूं तेरी उन शैतानियों को,
तू जो गया तो जैसे जिंदगी मुझसे रूठ गयी,
मेरी हर खुशी मुझसे छिन गयी,
याद आता है मुझे तेरा हर वक़्त मुझे सताना,
फिर मुझे नींद न आने पर हर रात तेरा मेरे साथ जागना,
दोस्ती का ये रिश्ता,
जो था तेरे मेरे बीच,
न जाने कब बन गया वो सबसे अजीज,
मैं तेरे बिना और तू मेरे बिना था अधूरा ,
फिर क्यों छोड़ गया तो मुझे अकेला,
डर लगता है अब मुझे किसी को दोस्त बनाने में
तेरी जगह किसी और को ज़िन्दगी में लाने में,
यूं तो बहुत दोस्त हैं जिंदगी में ,
पर तेरे जैसा यार नहीं है इस दुनिया में,
दिल के बहुत करीब था तू, मेरी ज़िंदगी का हिस्सा था तू

चार पाँच वर्षसँ दिनभरि हमसभ संगे रहति छलहुँ । कतेक समाचारक निमन्त्रण सोहनेक दोकानपर हमर रहति छल । मुदा सोहनजी दोस्ती त नहि तोडि सकैत छथि तखन रुसि एना गेला फिर्ता आवएके बाते नहि । एकटा कविता स्मरण अबैत अछिः
हर खुशी तकलीफ, साथ साथ जिया करते थे
हार हो या जीत एक दुसरे का साथ दिया करते थे
कभी तुम हमसे कभी हम तुमसे रूठ जाया करते थे
कभी हम तुम्हे और कभी तुम हमें मना लिया करते थे
एक दुसरे की हम खुद से ज्यादा परवाह किया करते थे
बस कल ही की बात लगती है

कारी शनिक चर्चा
पुसमे शनिए दिन हुनक कनियाँके टिपर ठोकि देने छल । आ आइ शनिएकऽ ओ स्वर्गीए भऽ गेलाह । दिनभरि दोसरके लेल सोचएवला व्यक्तिक लेल ई कारी शनि बेर बेर समस्या लऽ कऽ आबि रहल अछि ।

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