मैथिली कविताः सखि हे जागल मनके आस

Byदूधमती साप्ताहिक

८ श्रावण २०७७, बिहीबार ०३:०४ ८ श्रावण २०७७, बिहीबार ०३:०४ ८ श्रावण २०७७, बिहीबार ०३:०४
काशिकान्त झा रसिक
सखि हे जागल मनके आस
भोरे कौवा कुचरल आंगन बात लगैय खास
धकधक हमर छाती धरके फरके बामा आँखि
मन उरल भोरेसँ लगाक राजहंसके पाँखि
भाथी सनके हमर भगेल गरमा गरम श्वास
सखि हे जागल मनके आस
अबइछथि ओ घर हमर सुनिक नोर सुखाएल
जानि नई कते दिनसँ अई हमर मन दुखाएल
मन हमर उत्साहित होइय मेटल मनक प्यास
सखि हे जागल मनके आस
चारिबजे भोरे हम निपल अंगना घर दुआरि
रिझिम बुन्द परइय मेघक संगे बहल बिहरि
मनेमन सोचइछी एखन मनके हायत उसास
सखि हे जागल मनके आस
राति हम सपनामे देखल सुन्दर सन गजराज
हमरा संगे ठाढ देखइय गामक सकल समाज
एहन श्वप्न पहिने नई देखल मनमे अई बिश्वास
सखि हे जागल मनके आस
गुदगुदीसन मनमे लागल अपने मन लजाएल
दरबजासँ जहिना पहु आंगनमे चलि आएल
आब कतसँ शुरु करब गप कैलथि घरमे बास
सखि हे जागल मनके आस

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