चाह चर्चाः मिट क्याम्पसक संस्थापक मनोज साहसंग

Byदूधमती साप्ताहिक

५ माघ २०८०, शुक्रबार ०७:५७ ५ माघ २०८०, शुक्रबार ०७:५७ ५ माघ २०८०, शुक्रबार ०७:५७ ,

एकटा दार्शनिक कहने छथि, ‘पाकल फलकेँ तीन पहिचान होइत

अछि । एक तँ ओ नरम भऽ जाइत अछि, दोसर ओ मिठ भऽ जाइत अछि, तेसर ओकर रंग बदलि जाइत अछि । इएह तरहेँ परिपक्व व्यक्तिक तीनटा पहिचान होइत अछि पहिने ओकरामे नम्रता होइत अछि, दोसर ओकर बाणीमे मिठास होइत अछि आ तेसर ओकर चेहरापर आत्मविश्वासक रंग होइत अछि ।’
लहक–चहकमे शुरुएसँ ओ विश्वास नहि करैत छथि । स्वभावसँ शान्त देखल जाएवला मिट क्याम्पसक संस्थापक मनोज साह बुद्धिक बहुत तीक्ष्ण छथि । बहुत कम बजैत छथि, पहिरन–तहिरन एकदम समान्य, एकरबादो एकहिबेरमे लोक हिनकासँ आकर्षित भऽ जाइत अछि । एकटा दार्शनिक कहने छथि, ‘जीवनमे अपन व्यक्तित्व शुन्य राखू अपितु ओहिमेसँ किओ घटा नहि सकए । परञ्च जकरासंग ठाड़ भऽ जाइ ओकर किमत दश गुणा बढि़ जाए ।’

 सुजीत कुमार झा

जनकपुरधामक मिट क्याम्पसक संस्थापक मनोज साहकेँ कड़ा अनुशासनवला शिक्षकक रुपमे पहिचान अछि । एखनो विद्यार्थी बदमासी कएलक कि डण्टा सीधे ओ घुमा दैत छथि । एक महिना पहिने ९ आ १० कक्षाक विद्यार्थीसभकेँ पिटाइ पड़ल छल । जे विद्यार्थीकेँ मासिक परीक्षामे कम नम्बर आएल छल, ओकरासभकेँ ओ पिटाइ कएलन्हि । ओहिसँ एक महिना पहिने जकरा कम नम्बर आओत ओकरा पिटाइ लागत सचेत करौने रहथि । मुदा जे विद्यार्थी सचेत नहि भेल, ओकरा दण्डित कएल गेल ।
मनोजक डरसँ विद्यार्थीसभ सदति डेराएल रहैत अछि । हिनक इएह खूबीक कारण मिट स्कूल वा क्याम्पसक अभिभावकसभक पहिल पसिन वनल अछि । केहनो वदमास विद्यार्थी मिटमे पहुँचल कि शान्त भऽ जाइत अछि ।
एकदिस दण्ड देवएमे कड़ा छथि तँ दोसरा दिस विद्यार्थीक कोनो समस्या भेल, एकटा जिम्मेवार अभिभावक जकाँ ओ ठाढ़ भऽ जाइत छथि । ‘हमर स्कूलक विद्यार्थीसभ बालबच्चा अछि, ओकर कोनो समस्या भेल हम चुप्प नहि रहि सकैत छी, पीटबो करैत छी बच्चेसभक हितक लेल,’ मनोज कहैत छथि ।
विद्यार्थी माने शिक्षित, सभ्य आ चेतनशील नागरिक अछि । विद्यार्थी जीवन मानव जीवनक अनमोल जीवन अछि । ई बितलाक बाद पुनः फिर्ता नहि अबैत अछि । ई अवस्थामे शिक्षा ग्रहण कएलापर, अपन लगनकेँ केन्द्रित करए पड़ैत अछि । अनावश्यक विवाद आ खराब मार्गमे स्वयंकेँ कनिको विकेन्द्रित नहि करबाक चाही जानकारसभ कहैत छथि ।
जनकपुरधामक दूटा बड़का शैक्षिक संस्थानक जखन चर्चा होइत रहैत अछि । एहिमे मिट क्याम्पस सेहो अछि । ओ क्याम्पसक संस्थापक मनोजक मेहनत आ सोच आइ एकरा ओहि उचाइमे लऽ गेल अछि । काठमाण्डूक प्रतिष्ठित काँलेज निष्टक संस्थापक डा. माधव वरालसँ मनोज ई क्याम्पस २०६६ सालमे किनने रहथि । मधेश आन्दोलनक क्रममे ई क्याम्पसमे आगि लगा देल गेल छल । विद्यार्थी सेहो घटिकऽ बहुत कम, एतेकधरि कि एक सय २५ टामे सीमित भऽ गेल छल । एहनमे कोनो व्यवसायिक संस्था किनएकेँ बाते सोचव मूर्खता जकाँ लागएवला छल एकरबादो, मनोज जोखिम लेलन्हि आ दिनराति मेहनत कऽ एकरा उचाइपर लऽ गेलथि ।
अप्राप्यं नाम नेहास्ति धीरस्य व्यवसायिनः ।
एकर अर्थ भेलैक – जकरा संग साहस अछि आ ओ मेहनत करत, ओकरा लेल किछु अप्राप्य नहि होइत अछि ।
‘चुनौति छल पैसा लगौलाक बाद, फिर्ता आओत कि नहि मुदा जोखिम मोल लेलहुँ आ आइ ठीक अवस्थामे पहुँच गेल छी,’ मनोज कहैत छथि । ई क्याम्पस किनए लेल जनकपुरधामक पीडारी चौकमे रहल २६ धुर आ गामपरक १० कट्ठा जमीन बेचि देने रहथि । घरमे रहल धेल ओसारल पाँचो भायके सभ पैसा अहीमे लागि गेल छल । ओ स्कूल मनोज सभ भाय मिलकऽ ८० लाखमे किनने रहथि ।
कहल जाइत अछि – एकटा इच्छासँ किछु नहि बदलैत अछि, एकटा निर्णयसँ किछु चीज बदलि जाइत अछि मुदा एकटा दृढ निश्चयसँ सभकिछु बदलि जाइत अछि । मनोजक दृढ निश्चयक फल अछि मिट ।
एखन तँ हुनक मिटक नामसँ एकहि प्रागंणमे स्कुल सेहो चलि रहल अछि । स्कुलक स्थापना २०६८ सालमे कएलन्हि । स्कुलक अतिरिक्त बेचलरमे ३ टा सेक्सन, कमर्श ११ मे ३ टा, साइन्स ११ मे तीनटा सैक्सन अछि । हिनक क्याम्पसमे १४ सयसँ बेसी विद्यार्थी अछि । ‘एहिबेरसँ ११ कक्षामे कानुनक सेहो पढ़ाइ शुरु कऽ रहल छी,’ ओ जानकारी देलन्हि ।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।
मनुष्यक शरीरमे रहएवला आलस्य हुनक सभसँ बड़का शत्रु होइत अछि, परिश्रम जेहन दोसर कोनो अन्य मित्र नहि होइत अछि, कारण परिश्रम करएवला व्यक्ति कहिओ दुःखी नहि होइत अछि ।
स्वामी विवेकानन्द जी कहने रहथि यदि अहाँ सफल जीवन जीबए चाहैत छी, तँ एकर पहिल सीढ़ी आत्मविश्वास अछि । जाहि व्यक्तिक भीतर आत्मविश्वास नहि होइत अछि ओ बलवान भऽ कऽ सेहो कमजोर बनल रहत । जखनकी एकर विपरीत जखन कोनो व्यक्तिमे आत्मविश्वास भरल रहैत अछि, तँ ओ कमजोर भऽ कऽ सेहो बलवान कहाबैत अछि ।
स्वामी विवेकानन्दक अनुसार व्यक्ति जखनधरि जीबैत अछि, तखनधरि ओकरा सीखैत रहबाक चाही । अनुभवसँ बड़का शिक्षक कोनो दोसरा नहि होइत अछि । ओ कहने छथि – एहन कोनो कार्य नहि अछि, जे मनुष्य नहि कऽ सकैत अछि । संसारक पूरे सामथ्र्य आ उर्जा स्वयंक भीतर उपस्थिति अछि । यदि अहाँ प्रयास करब तँ अहाँ किछुओ कऽ सकैत छी आ निश्चय अहाँकेँ ओहिमे सफलता सेहो भेटत ।
मनोज स्वयं कहैत छथि, ‘जीत वा सफलता सुनिश्चित करएकेँ तरिका अछि हारक सम्भावना समाप्त कऽ दी । सफलताक तैयारीक महत्वपूर्ण भाग अछि ओ कारककेँ पहिचानकऽ मूलसँ समाप्त कऽ देब जाहिसँ असफलता आबिओ नहि सकैत अछि ।’ ई ओ कारक अछि, जे अहाँक तैयारीक कमजोर कड़ी अछि । ई ओ कारक अछि, जे लक्ष्यसँ अहाँकेँ ध्यान विचलित कऽ सकैत अछि । ई ओ कारक अछि जिनका अहाँक प्रतिद्वन्द्वी लाभ उठा सकैत अछि । पराजयसँ बचए विजयकेँ निमन्त्रण अछि । नोक्सानीक सम्भावना समाप्त भेलापर नाफाक शुरुआत अछि । इएह तरहेँ असफलताक सम्भावनासँ रहित तैयारीए सफलताक ग्यारेन्टी अछि ।
सफलताक मार्गपर व्यक्तिक गाड़ी तखनधरि चलैत अछि, जखनधरि एहिमे लगन एवं उत्साहक इन्धन होइत अछि । लगन एवं उत्साह उत्पन्न होइत अछि समर्पण एवं इच्छासँ । सफलताक पहिल शर्त, पहिला सूत्र ई अछि जे सफलताक लेल एहन इच्छा होएबाक चाही जेना जीवनक लेल प्राणवायुक । सफलताक रहस्य ध्येयक दृढ़तामे अछि ।
समयक महत्व दर्शाबैत बहुत कहावत, लोकोक्ति संसारक करिब–करिब हरेक भाषामे भेट जाएत । ई सत्य सभ गोटे मानब जे समय अपन चालसँ चलैत अछि नहि कि धीमा आ नहि तेज । समय हुनका लेल बढि़या चलब प्रतीत होइत अछि, जे समयक संग चलैत अछि आ हुनका लेल खराब चलैत अछि, जे समयसँ पाछाँ चलैत अछि वा तेज भागएकेँ प्रयास करैत अछि । जखनधरि समय प्रबन्धन (टाइम मैनेजमेन्ट) नहि हएत, तखनधरि समय हमरसभक नियन्त्रणक बाहर चलैत रहत ।
भोरमे सवा ६ बजे मनोज क्याम्पस चलि अबैत छथि । क्याम्पस खुजल रहए वा बन्द, हिनक दिनचर्यामे बदलाब नहि होइत अछि । हँ तखन साँझमे कनि उपर नीचा भऽ जाइत अछि । जाढ़मे साँझ ७ बजेधरि आ गर्मीमे राति ८ बजेधरि क्याम्पसेमे ओ रहैत छथि । ‘घरमे मने नहि लागल भोजन जलपान सभ क्याम्पसेमे करैत छी,’ ओ कहैत छथि ।
दीर्घसूत्रता वा काजक आइ–काल्हिवला टालमटोल हिनक शब्दकोषमे अछिए नहि । ‘आइ कि करबाक छैक, भोरमे रुटिन बनेलहुँ आ साँझधरि पूरा करब हमर बचनबद्धता रहैत अछि,’ ओ स्वयं कहैत छथि । ‘क्याम्पस आ स्कूलक सफलतामे शिक्षक आ कर्मचारी टिमक सभसँ बड़का हात रहल, फेर विद्यार्थी आ अभिभावकक योगदान ओतवए,’ ओ बेर–बेर कहैत छथि । अपन विकासमे भैया डा. विनोदकुमार साह आ भाइसभक योगदानकेँ सेहो ओ बेर–बेर स्मरण करैत छथि ।
धुनिसँ एकटा बढि़या बात सिखएकेँ भेटैत अछि, जखन जीवनमे कोनो वाट देखाइ नहि दैत रहए बहुत दूरधरि देखएकेँ प्रयास व्यर्थ अछि, धीरे–धीरे डेग बढ़बैत चलु बाट खुजैत जाएत । एकटा दार्शनिक कहने छथि, ‘सफलता हरेक समय ओकरे भेटैत अछि, जे ओकरा पाबए लेल अपन पूरा ताकत लगा दैत अछि ।’ करिब–करिब एहने स्थिति हिनको छन्हि ।
मनोजक जन्म २०२५ बैशाख १ गते महोत्तरीक लोहारपट्टी नगरपालिका ३ महदैया तपनपुरमे भेल अछि । हिनक माताक नाम स्व. गंगा देवी साह पिताक नाम स्व. हरिकृष्ण साह अछि । हिनक ५ भाय आ एक बहिन अछि । पाँचो भायमे एतेक घनिष्टा छन्हि जे हिनकासभके पाँचो पाण्डव कहल जाइत अछि । हिनक परिवार पढ़ए लिखलमेसँ अबैत अछि दूटा भाय पीएचडी कएने छथि तँ मनोज अपनो स्नातकोत्तर कएने छथि । एकटा भाय मेकेनिकल इन्जिनियरिगं कऽ एमबीए कएने छन्हि । बहिन–बहिनौइ दुनू सप्तरीक कृषि विकास बैंकक दूटा शाखाक म्यानेजर छन्हि ।
कनियाँक नाम सीमला कुमारी साह अछि । ओ पूर्णतः गृहणी छथि । मनोज कहैत छथि, ‘बाहरक विभाग हमर सभक आ घरक विभाग कनियाँ आ भौजी सभक रहल अछि, घरसँ जुड़ल हरेक काज उएहसभ करैत छथि ।’ जेठ लड़का डा.गोविन्द साह महात्मा गान्धी मेडिकल काँलेज वारडा सेवा ग्राम महराष्ट्र भारतसँ एमबीबीएस कएने छन्हि तँ छोट लड़का रोविन साह भिआइटी भेल्लोरसँ कम्प्युटर इन्जिनियर पढने छन्हि । दुनू लड़का एखन अमेरिका पढ़ए गेल छन्हि । ओ कहैत छथि, ‘एकटा एमडीक तैयारी कऽ रहल अछि तँ दोसर एमटेकक पढ़ाइ शुरु कऽ देने अछि ।’
मनोजक प्रारम्भिक पढ़ाइ गाम स्कूलमे भेल रहन्हि । ओ १ कक्षासँ ३ कक्षाधरि श्री जनता प्राथमिक विद्यालय महदैयामे, ४ कक्षासँ ७ कक्षाधरि राजर्षि जनक मावि कुर्था, ८ कक्षासँ १० कक्षाधरि सरस्वती नमूना मावि जनकपुरधाम, एकाउण्ट आ फाइनेन्ससँ स्नातकोत्तर त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ कएने छथि । पढ़ाइक बीचमे एकदू वर्ष खेतीक काज सेहो कएलन्हि मुदा स्नातकोत्तर कएलाक बाद लगातार शिक्षण पेशासँ जुड़ल छथि । ओ कहैत छथि, ‘२०५८ सालमे जनकपुरधामक मोडेल क्याम्पस आ २०५९ सालमे मिट क्याम्पससँ जुड़लहुँ आ ट्युशन शुरु कएलहुँ ।’ ३ वर्ष मिटमे पढ़ौलाक बाद ओ क्याम्पस छोडि़ देने रहथि, दिनभरि मोडेलेमे पढ़बैत फेर ट्युशन खूब चलन्हि अही क्रममे ई मिट क्याम्पस किन लेलन्हि ।
एकटा दार्शनिक कहने छथि, ‘उचाइपर उएह पहुँचैत छथि, जे बदला नहि बदलाव लाबएकेँ सोच रखैत छथि ।
परीक्षामे चोरीक ई सभदिन विरोध करैत रहलथि अछि । ई चोरी विद्यार्थीक भविष्य समाप्त कऽ रहल कहैत छथि । विद्यार्थीकेँ मोबाइलसँ दूरी बनावए लेल कक्षामे अनुगमनक क्रममे जाइते कहैत छथि तँ अभिभावकसभकेँ सेहो सलाह दैत रहैत छथि । ‘हम तँ अभिभावक सभकेँ कहैत छियैक १२ कक्षाधरि मोबाइल आ लैपटाँप विद्यार्थीकेँ देबए नहि करु,’ ओ कहैत छथि ।
एकटा दार्शनिक कहने छथि, ‘पाकल फलकेँ तीन पहिचान होइत अछि । एक तँ ओ नरम भऽ जाइत अछि, दोसर ओ मिठ भऽ जाइत अछि, तेसर ओकर रंग बदलि जाइत अछि । इएह तरहेँ परिपक्व व्यक्तिक तीनटा पहिचान होइत अछि पहिने ओकरामे नम्रता होइत अछि, दोसर ओकर बाणीमे मिठास होइत अछि आ तेसर ओकर चेहरापर आत्मविश्वासक रंग होइत अछि ।’
लहक–चहकमे शुरुएसँ ओ विश्वास नहि करैत छथि । स्वभावसँ शान्त देखल जाएवला मनोज बुद्धिक बहुत तीक्ष्ण छथि । बहुत कम बजैत छथि, पहिरन–तहिरन एकदम समान्य, एकरबादो एकहिबेरमे लोक हिनकासँ आकर्षित भऽ जाइत अछि । एकटा दार्शनिक कहने छथि, ‘जीवनमे अपन व्यक्तित्व शुन्य राखू अपितु ओहिमेसँ किओ घटा नहि सकए । परञ्च जकरासंग ठाड़ भऽ जाइ ओकर किमत दश गुणा बढि़ जाए ।’
सामाजिक काजमे सेहो आइकाल्हि ओ बहुत सक्रिय देखल जाइत छथि । भारतक अयोध्यामे रामललाक मन्दिर जे बनल अछि । ओ मन्दिरक प्राणप्रतिष्ठासँ पूर्व सीता माताक नैहरिसँ भार गेल छल ओ भारमे तीर धनुष लऽ मनोज स्वयं गेल छलथि ओ तीर धनुषकेँ अयोध्यामे बहुत चर्चा भेल छल ।
जनकपुरधामक विकास विषयमे हिनक स्पष्ट धारणा अछि जाधरि सोच परिवर्तन नहि हएत एहिठामक विकास सम्भव नहि अछि । सम्भव कोना हएत ? चाह चर्चाक क्रममे ओ कहैत छथि, ‘नगरपालिका, प्रदेश सरकार, संघीय सरकार आ स्थानीयवासी सभकेँ विकासक लेल सपथ खाए पड़त ।’ भोर ६ बजेसँ पहिने जानकी मन्दिर सहित नगरक सफाइ भऽ जएबाक चाही, जानकी मन्दिर सौन्दर्यीकरणक लेल काज करए पड़त, जनकपुरधाम नगरपालिकाक मेयरकेँ दैनिक काजसँ बेसी योजनामे समय लगावए पड़त सेहो कहैत रहैत छथि ।
शिक्षाक दृष्टिसँ जनकपुरधामक अलग पहिचान अछि । सशस्त्रार्थक लेल लोक जनकपुरधाम अबैत छल अर्थात पढ़ाइक सभदिन मिथिला केन्द्र रहल अछि । पुनः एहन वातावरण वनावए पड़लैक । एहन वातावरणक काज शुरु भऽ गेल अछि उल्लेख करैत मनोज आगाँ कहैत छथि, ‘विद्यालय वा क्याम्पसमे पढ़ाइक वातावरण वनए लागल अछि, चीट चोरीक काज रुकितए क्रान्तिकारी परिवर्तन देखएमे आओत ।’
भविष्यक योजनाक सम्बन्धमे ओ किछु वतावए नहि चाहैत छथि । कम बाजएकेँ कला एहिठाम देखल जाइत छन्हि । मुदा एतवए कहि कऽ चाह चर्चाक अन्त्य करए चाहैत छथि, ‘स्कूल क्याम्पसमे देखल गेल कमी कमजोरीक समाधान करब आ इएह क्षेत्रकेँ आगाँ बढ़ाएब ।’
एकटा दार्शनिकक बात एतए राखए चाहब – एकटा नदी एकटा पहाड़केँ काटि दैत अछि, मुदा अपन तागतसँ नहि ! अपितु अपनाद्वारा कएल गेल लगातारक प्रयाससँ ।

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