मैथिली कथा – छोटसन बात

Byदूधमती साप्ताहिक

१४ पुष २०८०, शनिबार ०९:४२ १४ पुष २०८०, शनिबार ०९:४२ १४ पुष २०८०, शनिबार ०९:४२

ओ आगाँ बढि़ कऽ सड़क पार करैत अछि आ हुनका लग पहुँच जाइत अछि, ‘की बात अछि बाबूजी ? अहाँक लेल दौड़ब नोक्सानदेह अछि, अहाँ बुझैत छी फेर …..?’ ओ कनीक तमसाइत अछि । पहिल बेर स्मरण अबैत अछि ओकरा गेलाक बाद बाबूजीकेँ नियन्त्रित करएबला किओ नहि रहत । ओ अपन शरीरकेँ ध्यान नहि करता ।
‘तो ओ स्वीटर बिसरि आएल छलएँ तकियाक नीचा …..। तोहर माँ कहलकहुँ तोरा दऽ आबए लेल ….एहिद्वारे कनीक दौड़ए पड़ल ….ले ब्यागमे राखि ले ….,’ बाबूजी तेज गतिमे बजैत रहला आ ओकरा देखैत रहला ।
ओकरा अचानक बाबूजी पर दया आबए लागल, फेर अपना उपर । फेर बाबूजीकेँ उपर सिनेह भऽ गेल आ अपना उपर तामस । स्थिर गम्भीर आँखि आ नम्हर श्वासक बीच बाबूजी कतेक चिन्ता नुका कए रखने छथि । ओकर मोन करैत अछि अपना हृदयमे बाबूजीक लेल नुकाएल पूरा प्रेम सार्वजनिक कऽ दी । की पता फेर बाबूजी ओकरा जाइत समय पयर छुबएकेँ बदला गला लगालथि । ओ डुबैत आँखि आ काँपैत हाथसँ स्वीटर हाथमे लऽ किछु देर ठाढ़ रहल आ बाबूजीकेँ देखैत रहल ।

 

 सुजीत कुमार झा

बाहर एखनो प्रकाश अछि । हल्का–फुल्का इजोत जे एखन किछुए देरमे अन्हारमे परिवर्तित भऽ जाएत । माँ भानस घरमे एखनो किछु खटपट कऽ रहल अछि । जखन की ओकरा बढि़या जकाँ बुझल छैक जे दुनू सुटकेश आ ब्याग प्याक भऽ गेल अछि आ कोनो दोसर चीज राखएकेँ स्थान नहि अछि ।
ओ कुर्सी पर आरामक मुद्रामे बैसल अछि । आगाँमे अमितेश पलङ्ग पर बैसल अछि । बाबूजी दलानपर टहलि रहल छथि । आ पता नहि कोन चीजक प्रतीक्षा कऽ रहल छथि । ओ कखनो बाहर दिस देखैत छथि, कखनो अमितेश दिस आ कखनो भानस घर दिस । सभ मानू कोनो चीजक प्रतीक्षा कऽ रहल होइथ ।
घड़ीक सुई एक स्थानसँ दोसर स्थान जा कऽ एकटा निश्चित स्थान पहुँच जाएब कतेक उदास घटना अछि आ कतेक थका देबएबला प्रतीक्षा । बाबूजी बाहर टहलैत –टहलैत ओकरा बीच–बीचमे देखि रहल छथि । जेना हुनका विश्वासे नहि भऽ रहल हुए, ओ ओहि घरक टुटल कुर्सी पर बैसल छथि । किछु–किछु कालपर भीतर आबि रहल छथि ।
‘सरेशक पता आ फोन नम्बर कतए रखने छएँ ?’
‘डायरीमे,’ ओ ज्याकेटक जेबीकेँ हाथसँ छुबैत अछि ।
‘कतहुँ दोसर स्थानपर लिखि ले, यदि ई डायरी हेरा गेलहुँ तऽ…..?’
किछु देर ठाढ़ रहैत छथि फेर बाहर जा कऽ टहलए लगैत छथि । माँ एकटा डिब्बामे किछु लऽ कऽ बाहर अबैत अछि, ‘एकरा ब्यागक साइडबला प्याकेटमे स्थान बना कऽ राखि ले ।’
‘की छैक ई ….?’ ओ डिब्बाकेँ बिना छुने पुछैत अछि ।
‘बाटमे खाए लेल बगिया ….।’
‘माँ हम कहलीऔ ने प्लेनमे भोजन भेटैत अछि,’ ओ कनी तमसा कऽ बजैत अछि ।
‘…..मुदा ई कनीके तऽ छौक, किछु–किछु कालपर निकालि कऽ खाति रहिहएँ,’ माँ कनीक डेरा जाइत अछि ।
‘माँ तहुँ ने ….।’
अमितेश उठिकऽ माँकेँ हाथसँ डिब्बा लऽ लैत अछि, ‘लाउ आन्टी, हम राखि दैत छियैक । दू चारिटा अपना जेबमे आ बाँकी ब्यागमे ।’
‘हँ बेटा, लिअ राखि दिऔ ।’
बाबूजी फेर भीतर अबैत छथि, ‘बेटा, ओतए जा कऽ अपन हिसाब किताब देखि कऽ हमरा फोन करिहे । आओर पैसाक आवश्यकता होउक तऽ बतबिहे । पढ़ाईमे ध्यान लगबिहे, पैसाक कोनो टेन्सन नहि करिहए….।’
ओकरा बुझल अछि बाबूजीक आदत छन्हि, जाहि चीजकेँ सभसँ बेसी आवश्यकता होइत अछि ओकरे सभसँ बेसी उपलब्ध देखाबएकेँ प्रयास करैत छथि ।
अमितेश चुपचाप बैसि बगिया खा रहल अछि । बीच–बीचमे ओकरा देखि रहल अछि आ बिहुँसि रहल सेहो । ई एतेक चुप्प तऽ कहिओ नहि रहैत अछि । बगिया खाएमे एना कऽ जुटल अछि जेना बगिया खाएब संसारक आवश्यक काज अछि आ ओकरा पढ़ाई करए बेलायत जाएब एकटा छोटछिन बात ।
एखनसँ तीन घण्टाक बाद ओ फ्लाइटमे हएत । सभसँ दूर …..माँ बाबूजीसँ, एहि टोलसँ, एहि शहरसँ, एहि देशसँ …….।
किछुए देरमे रेवती सेहो आबि जाइत अछि ।
‘सभ किछु तैयार अछि ने ?’ ओ अमितेशसँ पुछैत अछि ।
‘हँ…हँ सभ तैयार अछि । मात्र ….निकलैत छी, ’अमितेश स्थिरेसँ एकटा बगिया निकालि कऽ रेवती दिस बढ़ा दैत अछि ।
अन्य दिन होइत तऽ रेवती एतेक शान्तिसँ बगिया लऽ कऽ खा सकैत ? अमितेशक हाथसँ दोसरो छिनने बीना नहि छोडैÞत आ अमितेश ओकरा छिनएकेँ लेल पटकि देने रहति । माँ हरेक दिन जकाँ दुनू दिस देखि कऽ कहए लगैत, ‘झगड़ा नहि करु बेटा । पुसमे बगियाकेँ अभाव थोरहे होइत अछि ।’
मुदा रेवती एकटा बगिया लऽ आरामसँ खाए लगल । माँ शोफा पर बैसिकऽ एकटक ओकरा देखि रहल छल । ओ बिहुँसि दैत अछि ।
‘की छैक माँ ? एना किए देखि रहल छएँ ?’
‘अ..ह, अपना खाए पिअब पर ध्यान रखिहे । राति कऽ दुध अवश्य पिबिहएँ आ ….फोन करैत रहिहएँ । पढ़ाई पर ध्यान दिहएँ आ चिठ्ठी बराबर लिखैत रहिहएँ ।’
‘आन्टी, आबके चिठ्ठी–तिठ्ठी लिखैत अछि, ई हरेक दू–तीन दिनपर इमेल करैत रहत । हम आएब तऽ एकर हालचाल बतबैत रहब,’ रेवती बाजल ।
‘ठीक छैक बौआ धु्रव गेलाक बाद तऽ अहीँसभ पर आस अछि ।’
ओ रेवती दिस प्रश्नवाचक आँखिसँ देखैत अछि । रेवती सेहो किछु बताबए लेल ओकरा दिस ताकि रहल अछि मुदा माँकेँ उपस्थितिसँ दुनू चुप्प अछि । ओ अमितेश दिस देखैत अछि । अमितेश ओकर आँखिक इशारा बुझि जाइत अछि । ओ उठि कऽ माँ लग चलि जाइत अछि ।
‘आन्टी अहाँ हाथक टमाटर आ लहसुनक चटनी बहुत नीक होइत अछि, कनी खाएकेँ मोन करैया ।’
‘जाउ ने बेटा भानस घरमे प्लेटमे राखल छैक । बाटी आ चम्मच ओहि ठाम अछि निकालि लेब,’ माँ ओतएसँ कनिको नहि उठए चाहैत अछि ।
‘नहि आन्टी प्लीज अहीँ दिअ ने ।’
‘अच्छा रुकू लबैत छी,’ माँ धीरेसँ उठि कऽ भानस घर दिस चलि जाइत अछि ।
‘की भेलहुँ ?’ ओ बेचेयन अछि ।
‘ओ सीधा एयरपोर्ट अएती,’ रेवती कहैत अछि ।
‘एतए आबि जैतैथि तऽ नीचा उतरि कऽ भेटि सकैत छलहुँ । एयरपोर्टपर तऽ बाबूजी सेहो हएता । की कहि कऽ परिचय कराएब हुनकर….?’
‘कहि देबैक क्याम्पसक साथी छथि,’ रेवती सलाह दैत अछि ।
‘हँ मुदा ….गला नहि मिल पाएब बाबूजीक आगा,’ अमितेश बिहुँसति बजैत अछि ।
‘नहि भगवान से बात नहि …..एखनधरि माँ बाबूजीकेँ किछु नहि कहने छी आब जाइत समय ….बादमे बताएब, सीधे फाइनल डिसिजनक समय….,’ ओ किछु सोचमे पडि़ जाइत अछि ।
‘बाबूजीकेँ एयरपोर्ट चलएकेँ लेल मना कऽ दिअ । किछु कहि कऽ बुझा दिऔन । कहि दिऔन दू गोटे तऽ जाइए रहल छथि,’ अमितेश आइडिया दैत अछि ।
‘हँ शायद इहे ठीक रहत,’ ओ सोचैत बड़बड़ाइत अछि ।
माँ चटनी राखि कऽ बाबूजी लग चलि गेल छल । दुनू अपनामे बात कऽ रहल अछि । आब असगरे मात्र एक दोसरकेँ संग रहएकेँ अभ्यास…?
बाबूजी फेर भीतर अबैत छथि, ‘ठण्ढासँ बचि कऽ रहिहएँ । ओतए ठण्ढ बहुत पड़ैत छैक । हरेक समय मफलर लगेने रहिहएँ ठण्ढ कानमे सभसँ पहिने आक्रमण करैत अछि । कान हरेक समय बान्हल रहबाक चाही । ई नहि जे फेशनमे केश नहि बिगरए एहिद्वारे मफलरे नहि लगाबी । स्वविवेकसँ काज लिहे । ओतए किओ देखए नहि एतहुँ । ओ तोहर घर नहि, बेलायत छैक ।’
बाबूजी बीतल किछु दिनसँ हरेक बातमे घुमा फिरा कऽ बेलायतक चर्चा अबश्य करैत छथि जेना पूरे तरहसँ ई कहए चाहैत छथि, तो बहुत दूर जा रहल छएँ ।
बाबूजी फेर टहलए लगैत छथि । माँ बाहर कुर्सी पर बैसल अछि ।
‘जी …,’ एतेक बातक जबाबमे मात्र ओ एक शब्द कहैत अछि जे बाहर पसरि रहल अन्हारमे गुम भऽ जाइत अछि ।
‘आइ एतेक ठण्ढा नहि अछि,’ रेवती कहैत अछि ।
‘हँ हमरा तऽ गर्मीए लागि रहल अछि,’ ओ कहैत अछि ।
‘ओ तऽ लगबे करत, अहाँ स्वीटर आ ज्याकेट दुनू पहिरने छी । हमरा देखू….,’ अमितेश अपन हाफ स्वीटर देखबैत अछि ।
‘हँ मित्र, बाबूजी बलजवरदस्ती…..।’
‘बाबूजीक प्रिय सपूत, आबतऽ उतारि दिअ । बाबूजी बाहर छथि । उतारि कऽ ज्याकेटक चेन बन्द कऽ लिअ । हुनका की पत्ता चलत,’ अमितेश सलाह दैत अछि ।
ओ ज्याकेट उतारि कऽ स्वीटर उतारि लैत अछि, फेर ज्याकेट पहिर कऽ ओकर चैन बन्द कऽ लैत अछि ।
‘हम सोचि रहल छी, जे स्वीटर नहि लऽ जाइ,’ ओ स्वीटरकेँ मोड़ैत कहैत अछि ।
‘सही सोचि रहल छी । ई पुरान स्वीटरकेँ लऽ जा कऽ की करब ? तीन–तीनटा बढि़या स्वीटर तऽ अछिए अहाँक संग…..,’ रेवती बुझबैत अछि ।
मुदा बाबूजी देखि लेता तऽ हुनका दुःख लगतन्हि । ओ स्वयं ओ स्वीटर हमरा लेल खासासँ अनने छथि,’ ओ हिचकिचाइत अछि ।
‘एखन नहि ने देखता । बादमे देखता तऽ सोचता धोखामे छुटि गेल अछि,’ रेवती स्वीटरकेँ मोडि़ कऽ तकियाकेँ नीचा राखि दैत अछि । फेर तीनू गोटे अचानक चुप्प भऽ जाइत अछि । रेवती आ अमितेश दुनू ओकरा दिस देखि कऽ बिहुँसैथि अछि ।
‘किछु कहि रहल छलीह की ?’ ओहो बिहुँसैथि अछि ।
‘नहि किछु खास नहि । मात्र इहे जे पहुँचते अपन पोस्टल एड्रेस हुनका मेल कऽ देब । जे स्वीटर अहाँकेँ लेल बुनि रहल छथि, किछुए दिनमे तैयार भऽ जाएत ओकरा कुरियर करतीह । कहि रहल छलीह बहुत बात करबाक अछि जे अहाँसँ एयरपोर्टपर करतीह हम कहलहुँ हमरा कहि दिअ हम ओकरा कहि देबैक तऽ तमसाए लागल छलीह….,’ रेवती बिहँुसति बाजल ।
‘अहाँसँ किए बतौतीह ? ओ बात अहाँ निनासँ किए नहि करैत छी ?’ ओहो बिहुँसति अछि ।
‘मित्र ओ नहि हमरा घास डालैत छथि आ नहि हमर डालल घास खाति छथि । हुनकासँ की बात करु, हमरा तऽ अहाँक रेखे पसिन अछि,’ रेवती मजाक करैत बाजल ।
ओ फेर बिहुँसैत अछि । ओ बुझैत अछि आओर कोनो दिन रहैत तऽ निनाकेँ नाम सुनिते रेवती हृदयपर हाथ राखि कऽ सभ बात धीरे–धीरे नाटकीय मुद्रामे कहैत । ओहो हुनकर मुहँ पर रेखाक नाम सुनिते एक दू मुक्का अवश्य लगा दैत मुदा आइ बात दोसर अछि । आइ हुनका लग समय नहि अछि । आधा घण्टा भीतर एयरपोर्टक लेल निकलत । ओहिसँ पहिने मित्रक बीच होबएबला बेबकुफीक रिवाइण्ड करब नीक लागि रहल छल ।
बाबूजी माँकेँ सँग फेर भीतर अबैत छथि, ‘आब चलए पड़त बेटा, कतहुँ पहुँचएमे अबेर नहि भऽ जाए ।’
‘जी अंकल, एखन तऽ टाइम अछि,’ रेवती कहैत अछि ।
‘अरे भाइ ट्राफिक जामक कोनो भरोषा अछि, कखनो अबेर कऽ सकैत अछि ।’
माँ नोराएल आँखिसँ देखैत अछि, ‘तोरा गेलाक बाद घर एकदम खाली भऽ जाएत ।’ लगैत अछि माँ आब कानि देत ।
‘कमअन आन्टी, हमसभ खाली होबए देब तब ने ….,’ अमितेश माँकेँ कनहा पर हाथ रखैत अछि । माँ ओकर बाँहि थपथपा दैत अछि ।
‘चल बेटा चल, आब चलए पड़तहुँ ….कतहुँ अबेर नहि भऽ जाए,’ बाबूजी लग आबि कऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि । ओकरा बाबूजीक एहि बातसँ तामस भऽ जाइत अछि । जाहि बातकेँ एकबेर मँुहसँ निकालि दैत छथि ओकरे पाछु पडि़ जाइत छथि ।
‘चल बेटा, आउ रेवती….,’ हुनका सोचलाक किछुए देरमे बाबूजी आओर एकबेर अपन बात दोहरबैत छथि आ एकटा ब्याग उठाबएकेँ उपक्रम करैत छथि ।
‘अंकलजी अपने किए परेशान हएब ? हम सभ छी ने ….। अपने आराम कएल जाओ,’ रेवती ई कहैत ब्याग उठा लैत अछि आ अमितेश दुनू सुटकेश ।
‘नहि बेटा, हमहुँ चलैत छी,’ बाबूजी कनीक परेशान जकाँ बुझाइत छथि ।
‘छोडू अंकल, डाक्टर ओहिना अपनेकेँ बेसी चलए फिरएसँ मना कएने अछि । अपने एतहि रहल जाओ । हमसभ छी ने….,’ कहैत अमितेशे बाहर निकलि जाइत अछि आ पाछु–पाछु रेवती सेहो ।
‘डाक्टर दौड़एकेँ लेल मना कएने छथि । हमरा दौड़ कऽ थोरहे जेबाक अछि ।……चलैत छी हमहुँ……,’ बाबूजी हुनकर कनहापर हाथ रखैत उदास रुपमे हँसैत छथि जे ओ उदास साँझकेँ आओर उदास कऽ दैत छथि ।
‘रहए दिऔक बाबूजी, अहाँ बेकारमे परेशान हएब,’ ओ बाबूजीक पयर छुबैत अछि आ फेर माँकेँ ।
‘बेटा जानकी जीकेँ पयर छु ले,’ जानकीजीक सीसामे राखल मूर्ति दिस इशारा करैत अछि ।
ओ आगाँ बढि़ कऽ जानकीजीकेँ प्रणाम करैत अछि, जकर सीसामे बाबूजीक उदास चेहरा दोखाई दऽ रहल छल ।
ओ बाहर आबि जाइत अछि बाबूजी आस भड़ल आँखिसँ ओकरा देखैत रहैत छथि । माँ ओकरा दही खुअबैत अछि । ओ जल्दिसँ दही खा कऽ निकलि जाइत अछि ।
तीनू घरसँ निकलि कऽ सड़क पर आबि जाइत अछि । ओ स्वयंकेँ एहन स्थितिमे पबैत अछि जतए प्रशन्नताक अनुभव एहिद्वारा नहि भऽ रहल अछि किछु छुटि जाएबाक पीड़ा ओकरापर हाबी भऽ जाइत अछि । अपन मित्र, अपन स्थान, अपन माहौल…..। एकटा नव संसारमे जएबाक प्रशन्नता पता नहि कतए हेराएल जकाँ बुझाति अछि । करीब सय मिटर चललाक बाद रेवती सिगरेट जरा कऽ एक–एक टा थम्हा दैत अछि । तीनू गोटे सिगरेट फुकैत ट्याक्सी दिस बढ़ए लगैत अछि ।
‘आइ भोरमे कृष्णेकेँ घर पर पुलिसक छापा पड़ल अछि,’ रेवती सिगरेटक धुवाँ छोड़ैत कहैत अछि ।
‘हँ हुनकर पापा विजनेसक नाम पर किछु गलत धन्धा करैत छथि,’ अमितेश बजैत अछि ।
ओकर मोन भोरेसँ भाड़ी भऽ रहल अछि । ओ अपन बीतल जीवन आ आबएबला जीवनक विषयमे सोचए लगैत अछि । ओ दुनू गोटेक बात सुनि कऽ ओकर मोन डुबैत जकाँ लागि रहल अछि । ओहो सभ तऽ ओकरा बीना असगरे भऽ जएत । ओ कतेक मिस करत ओकरासभके …..।
‘मित्र सुनू, ओतएकेँ लड़की बहुत फ्रेन्क होइत अछि । दू चारिटा पटि जाएत तऽ बताएब । हमहूँ ट्राइ करब । की अमितेश ?’ रेवती जोड़सँ हँसए लगैत अछि ।
ओहो बिहुँसैत अछि । अमितेश ओकरा दिस देखैत अछि । ओ कतेक सफाइसँ हृदय दुखाबएबला बात नहि करए चाहैत अछि ।
‘हम ओतए तोरा सभके बहुत मिस करब….,’ ओ भाड़ी आवाजमे कहैत अछि । अमितेश ओकर हाथ अपना हाथमे पकडि़ कऽ दबा दैत अछि ।
‘कहिओ–कहिओ हुनको मिसकलीअ जे अपन प्रेम स्वीटरक रुपमे पठाबएबाली छथि …..,’ रेवती अपन आदतक अनुसार भावुक भेलाक बादो बातकेँ हँस्सीमे उड़ा दैत अछि ।
‘अंकल आबि रहल छथि । पाछु पल्टएसँ पहिने सिगरेट फेक दिअ,’ अमितेशे धीरेसँ बजैत अछि ।
ओ सिगरेट फेकि कऽ पाछू घुमैत अछि । बाबूजी करीब दौड़ैत आबि रहल छलाह । ओ आगाँ बढि़ कऽ सड़क पार करैत अछि आ हुनका लग पहुँच जाइत अछि, ‘की बात अछि बाबूजी ? अहाँक लेल दौड़ब नोक्सानदेह अछि, अहाँ बुझैत छी फेर …..?’ ओ कनीक तमसाइत अछि । पहिल बेर स्मरण अबैत अछि ओकरा गेलाक बाद बाबूजीकेँ नियन्त्रित करएबला किओ नहि रहत । ओ अपन शरीरकेँ ध्यान नहि करता ।
‘तो ओ स्वीटर बिसरि आएल छलएँ तकियाक नीचा …..। तोहर माँ कहलकहुँ तोरा दऽ आबए लेल ….एहिद्वारे कनीक दौड़ए पड़ल ….ले ब्यागमे राखि ले ….,’ बाबूजी तेज गतिमे बजैत रहला आ ओकरा देखैत रहला ।
ओकरा अचानक बाबूजी पर दया आबए लागल, फेर अपना उपर । फेर बाबूजीकेँ उपर सिनेह भऽ गेल आ अपना उपर तामस । स्थिर गम्भीर आँखि आ नम्हर श्वासक बीच बाबूजी कतेक चिन्ता नुका कए रखने छथि । ओकर मोन करैत अछि अपना हृदयमे बाबूजीक लेल नुकाएल पूरा प्रेम सार्वजनिक कऽ दी । की पता फेर बाबूजी ओकरा जाइत समय पयर छुबएकेँ बदला गला लगालथि । ओ डुबैत आँखि आ काँपैत हाथसँ स्वीटर हाथमे लऽ किछु देर ठाढ़ रहल आ बाबूजीकेँ देखैत रहल ।
‘पूरे आवश्यक चीज राखि लेलएँ अछि ने ? ई याद रखिहए, मेहनत पर विश्वास रखिहए । सही बात कठीन होइक आ नम्हर, हरेक समय ओकरे चुनिहएँ । शरीर आ पढ़ाई दुनू पर ध्यान दिहएँ । पैसाक चिन्ता नहि करिहएँ । चलू आब जाउ, देखि रेवती ट्याक्सी लऽ अएलहुँ ।….बजा रहल छौक तोरा,’ बाबूजी सामान्य देखबाक पूरा प्रयास करैत छथि ।
‘जी ….,’ ओ नोराएल आँखिसँ पाछु घुमैत अछि । दू तीन डेग चलला पर बाबूजीक आवाज सुनाइ दैत अछि ।
‘कह तऽ हमहुँ चलबे करु…., ओहिना घरमे तऽ बैसले रहब….,’ बाबूजीक स्थिरे आवाज कहू वा नहि कहूकेँ संशयकेँ बीचसँ निकलि रहल छल । जमानाक पीड़ा आ निवेदन समेटल अपन आवाजकेँ ओ एहि तरहे प्रस्तुत करए चाहला जेना ओ बहुत सामान्य आ छोटसन बात कहलन्हि अछि आ एकरा नहि मानला पर सेहो कोनो फरक नहि पड़एबला अछि ।
ओ बाबूजीकेँ हाथ पकडि़ कऽ ट्याक्सी दिस बढि़ गेल । ओकरा पीड़ा कम भेल जकाँ बुझा रहल छल ।

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