कटाक्षः विदेशीक हाथ

Byदूधमती साप्ताहिक

१४ पुष २०८०, शनिबार ०४:१९ १४ पुष २०८०, शनिबार ०४:१९ १४ पुष २०८०, शनिबार ०४:१९

   सुरेन्द्र लाभ

‘विदेशीक हाथ एतेक नम्हर कोना होइत छैक ?’ आइधरि ज्ञानदेवजी केँ बुझबामे नहि अएलैक ।’ कोना एक देशसँ दोसर देशमे चलि जाइत छैक ओकरासभक हाथ ?’ स्वदेशीक हाथ एतेक छोट किया होइत छैक जे मात्र हाथे भरि रहैत छैक ? ई सरासर नाइन्साफी छैक । ई गैर बराबरी भेलै । एकरा विरोधमे आवाज उठबाक चाही । ज्ञानदेव आइ एहि गम्भीर विषय पर चिन्तन क’ रहल छलाह । भीतरे भीतर खुश भ’ रहल छलाह जे आइ बैसले बैसल एकटा नीक राष्ट्रवादी मुद्दा हाथ लागि गेलैन । आब ओ’ संसदकेँ हिला सकै छथि । सड़ककेँ गरमा सकै छथि । अपन जोरदार आवाजसँ संचारमे हेड लाइन बना सकै छथि ।
ओम्हर सड़कपर जोड़सँ आवाज उठलै– ‘दौडू,दौडू ! सब गोटे एम्हर अबै जाई जाउ ! देखियौ की भेलै एत्त’ ?’ जकरा कान मे जहिना ई आवाज पहुँचलै से तहिना ओम्हर दौड़ए लागल । एहि वर्ष देशमे चुनाव होमए वला छैने ! ककरा कखन कोन पार्टीके टिकट भेट जएतै तकर ठेकान नहि । तैसँ लोक समाज सेवाक कोनहु अवसरकेँ हाथसँ नै जाए देबए चाहैत छल ।
ज्ञानदेव एहि क्षेत्रक जानल मानल बुद्धिजीवी छथि । बहुत दिनसँ संसदमे पहुँचबाक सपना देखि रहल छथि । अएरे गैरे नत्थु खैरे सबके टिकट भेट जाइत छै आ’ हुनकासन विद्वान मुँह देखिते रहि जाइत छै । सब तरहक कर्म कएलनि, मुदा सब फेल । सब एलेक्सनमे पार्टी बदलैत गेलाह, मुदा कोनो पार्टी टिकट नै देलकनि । नारा बदललनि, संगति बदललनि, भाषा बदललनि, मुदा कोनो जोगार नै काज द’ रहल छलैक । भाषा त’ एहन ने बदललनि तकर ठेकान नहि। केयो मित्र सुझाव देने रहनि जे अँहा स्पष्ट वक्ता भ’ जाइछी, तैं सब गड़बडा जाइत अछि । तहियासँ ओ तेहन ने बिचवाला भाषा बाजए लगलाह जे सुन’ वला केँ लगैक जे ओ क्रान्तिकारी भाषण द’ रहल छथि, बुझ’ वलाकेँ किछु नै बुझाइ जे ओ ककरा सपोर्टमे आ’ ककरा विरोधमे बजैत छथि । अनुमान करएवलाकेँ एतबे बुझाइक जे भारी विद्वान छथि, किछु नीके बजैत हएता । मुदा सब दाओ बेकार जा’ रहल छलनि । दलसब हिनका चिन्हएसँ इन्कार क’ दैत छल । अही फ्रस्टेसनमे मादक पदार्थ सभक सेवन सेहो प्रारम्भ क’ देने छलाह । भाङ गाँजा हुनक प्रिय पदार्थ छल । कारण एहिमे दारु जकाँ गन्ध नै ने होइत छलैक ।
ओ सुट्टा मारलनि आ’ अपन खिड़कीसँ सम्पूर्ण नजारा देखलनि । भीड़ विस्तृत भ’ रहल छलैक । ओत्त’ जएबाक हेतु सोचए लगलाह । आइ हुनका लग रामवाण मुद्दा छलैक आ’ सड़क पर बढैत भीड़ सेहो छलैक । राष्ट्रवाद एहि देशक निर्विवाद मुद्दा छै । सर्वदलीय मुद्दा भेलाक कारण आइ ओ एहिपर जबरदस्त भाषण देताह आ’ कोनो ने कोनो दलक मोन जितीए लेताह । मुदा ओ आम आदमी जकाँ किया धरफराक’ जाएत ? अगिलग्गीसँ सबकिछु ध्वस्त भेलाक बादे ओत्त’ दमकल पहुँचैत छैक । अपराध भ’ गेलाकबादे घटना स्थलपर पुलिस पहुँचैत छै । तखन ओएह किया पहिने पहुँचत ? नै नै किछु आर’ भीड़ बढै, किछु हंगामा आर बढै तखन ओत्त’ पहुँचएकेँ मजे किछ आर’ छै । आखिर ओ’ भीआईपी भेलाह ने ? मुस्कुराइ्त ऊमरैत भीड़केँ देखैत रहलाह । ओहिठाम भीड़ बढ़बाक अथवा हंगामा होएबाक कारण की छै से बात ज्ञानदेव हेतु महत्वपूर्ण नै रहैन, महत्वपूर्ण रहै भीड़ । भीड़ माने अवसर । अवसर माने टिकट । टिकट माने सांसद । सांसद माने मन्त्री । आ’ मन्त्री माने मोक्ष माने सबकिच्छु माने वैतरणी पार माने स्वर्ग ..माने ..। ओ सोचैत सोचैत भावविह्वल भ’ गेलाह । किछु सुट्टाक निसा आ’ किछु सोचक असरसँ ओ खुजले आँखिसँ सपना देखए लगलाह ‘हुनका टिकट भेट गेलै लोक प्रचार प्रसारमे जान लगा देने छै’ हिनकर नामक चारु दिस जय जयकार भ’ रहल छै मतदान भेलै..ओ जीत गेलाह राष्ट्रपतिक आगू मन्त्री पदक सपथ ल’ रहल छैथ..आगा पाछाँ गाडी ..सुरक्षाकर्मी ..पिए सब जत्थाक संग मन्त्रालय पहुँचैत छैथ आ’ तत्पश्चात इन्द्रासनक सिँहासन अर्थात् अपन चीर प्रतिक्षित कुर्सी पर धरामसँ बैसैत छथि । सपना तखन टुटलै जखन बाहरक हल्ला भितर अएलै । तन्द्रा भंग भेलै । ओ मन्त्रीक कुर्सीपर नहि सिधा जमिनपर खैस परल छलाह । उठलाह । बाहर देखलनि । भीड़ आब बेसमहार भ’ गेल छलैक । यातायात ठप्प छलैक । चारुदिस हल्ला बाहेक किछु सुनाई नै द’ रहल छलैक । बस .. अही क्षणक प्रतिक्षा छलैक ज्ञानदेवजी केँ । डेग आगू बढौलनि ।
‘हौ की भेलै?’ भीड़ लग पहुँचिते हवामेँ पुछलखिन ।
‘हत्या ! दिन दहाडे हत्या भ’ गेलै सर’ केयो जबाब देलकै ।
‘हत्या ? एहिमे विदेशीक हाथ लगैए’ ओ झटसँ बजलैन ।
‘बिनु किछु देखने बुझने विदेशीक हाथ कहि देलियै ? वाह रे बुद्धिजीवी ?’ कोनो युवा चोट मारलकै ।
ज्ञानदेवकेँ जेना केयो छातिमे तीर घोपि देने होइक । ओ भीड़मे घुसिअएबाक प्रयास करए लगलाह – हत्या भेल स्थानमे जएबाक हेतु, ककर आ’ कोना हत्या भेलै से बुझबाक हेतु, किछु सत्य तथ्य प्रमाण खोजबाक हेतु । लोक हुनका भीतर अएबाक हेतु बाट देबए लागल – ‘आबए दहुन, एहि टोलक बहुत पैघ बुद्धिजीवी छैथ ।’
ओ भीतर घटना स्थलपर पहुँचलाह आ’ चौंकि उठलाह– ‘ई की ?’ क्षणभरिक निरिक्षणमे जेना हुनका सबकिछु बुझा गेल होइक । चेहरापर दू चारि बोरा गम्भिरता लदलैन आ’ बाहर निकललाह । सीधा जा’ एकटा खाली रिक्शापर ठाढ़ भ’ गेलाह । उपस्थित जनसमुदायकेँ अनुमान लागि गेलैक जे ज्ञानीबाबू आब सत्य तथ्य प्रस्तुत करताह । तँए कतहुसँ एकटा माइक आनल गेल आ’ हुनका हाथमे पकराएल गेल । ज्ञानदेवजी माइक पकडि़ भीड़ दिस देखलनि आ’ मुस्किया उठलाह । हुनका आइ ई भीड़ नहि, आमसभा लागि रहल छलैक । अहूसँ बेसी घोषणासभा लागि रहल छलैक, तँए आइ झण्डा गारिए देबाक छै । ओ भाषण प्रारंभ कएलनि – ‘किछु कहबासँ पहिने हम सम्पूर्ण जनसमुदायसँ आग्रह करब जे सर्व प्रथम मृत आत्मा प्रति एक मिनेट मौन धारण कएल जाए ।’
सबगोटे सहमतिमे मुड़ी डोलएलकै । सभाकेँ ज्ञानीबाबु आदेश देलखिन– ‘मौन धारण प्रारंभ ..।’ सभा शान्त भ’ गेलै । सभक आँखि बन्द आ’ मुड़ी निचा लटकल छल । केयो फुस फुसाएल– ‘ज्ञानीबाबूक नेता गिरी शुरू भ’ गेलै ।’ दोसर गोटे सेहो फुस फुसाएल– ‘लगइए एहिबेर इएह उमेदवार हएताह ।’ आब आर ने फुसफुस्सी बैढ़ जाई तँए एक मिनट पहुँचएसँ पहिनहि ओ घोषणा क’ देलखिन – ‘मौन धारण समाप्त ।’ लोकमे उत्सुकता बैढ़ रहल छलैक ‘असली मुद्दा हेतु । खेला होबे’ जे कहबी छलैक से आब प्रारंभ होबएवला छलैक ।
ज्ञानीबाबू गरजलाह – ‘हमर क्रान्तिकारी बन्धु बान्धव लोकैन ! आइ जे ई महान आ’ दुर्भाग्यपूर्ण घटना अपना टोल समाजमे घटल ताहिमे साफ साफ विदेशीक हाथ छै । हम गहिरसँ अध्ययन कएलहुँ तखन पता चलल जे ई हमरा सभक घरेलु मामिलामे विदेशी हस्तक्षेप छै । ओना हमरा सभक प्रत्येक काजमे विदेशीक हाथ रहैत अछि से बात पहिनहि कहने छलहुँ, मुदा कतेक गोटेके विश्वास नै भेल । ई राष्ट्रिय स्वाभिमानक विषय थीक । ई राष्ट्रवाद पर प्रहारक मुद्दा थीक। एकरा विरोध होएबाक चाही, घोर विरोध ।
सभामे एक गोटे खैनी मैल रहल छल । ताही क्रममे खैनीवला हाथपर दोसर हाथ मारलकै, थपडीसनक आवाज निकललै । ई सुनि दोसरो गोटेसब ताली मारलक– तर तर तर ‘। ज्ञानीबाबूक हौसला आर बुलन्द भ’ गेलै । ओ नारा प्रारम्भ क’ देलनि –
– ‘राष्ट्रबाद’ – ‘जिन्दाबाद ! जिन्दाबाद !’
– ‘स्वाभिमान’ – ‘अमर रहे ! अमर रहे !’
– ‘विदेशी हस्तक्षेप’ – ‘बन्द हो ! बन्द हो !’
नारा जोड सोरसँ चलि रहल छल । बिच्चेमे एकटा युवक चिचिया उठल – ‘की छोटछिन् बातमे एतेक पैघ नौटंकी ठाढ़ कएने छी ? मनुक्ख मरै अथवा ओकर हत्या होइक तखन त’ अहाँसब बौक भ’ जाईछी आ’ जखन आइ एकटा कुकुर संगे किछु भेलै त’ एतेक बड़का हँगामा ? आ’ सब बातमे विदेशीक हाथ ? अपनासब जेना हाथ विहीन होइ ! हद भ’ गेल ।’
ज्ञानीबाबूक मोन खट्टा भ’ गेलैक । तथापि हिम्मत कएलनि – ‘देखु, जकरा अहाँ एकटा कुकुर कहैत छियै तकरा कुकुर नै रक्षक कहियौ । ओकर नामो रक्षक आ’ कामो रक्षक । खओकरामे किछु दैवी गुण रहै । कहियो ककरो पर भुकलकै नै । कहियो कोनो घरमे चोर अबैक त’ रक्षक अपन भद्रताक परिचय दैत आँखि बन्द क’ लैत छलैक । ओ चुपचाप दिन राति कत्तहु पड़ल रहैत छल । एहन ईश्वरीय प्राणीकेँ कोना कुकुर कहबैक ? हम त’ सरकारसँ मांग करबै जे एकटा निष्पक्ष छानविन आयोगकेँ गठन होइक । संगहि दक्षिण, उत्तर,पूर्व आ’ पश्चिमकेँ सरकारसब सँ अविलम्व अपन अपन हाथ समेटि लेबाक हेतु सरकार वार्ता करए ।’
युवक फेर चिचिआएल– ‘ई रक्षक त’ अँहीक दरबज्जा पर परल रहैत छल । लगैत अछि ओत्तहि ओ किछु खा’ लेलक । देखलियै नै जे ओ कोना चारु नाल चित्त क’ क’ परल छल ।’ ज्ञानीबाबूकेँ मोन परलै, आइ भोरेसँ एकटा गाँजाक पोटरी गाएब छलैक । हो ने हो रक्षके भक्षक भ’ गेल हएत । तथापि चुप रहला, अपन नहि, विदेशी हाथ के आइ प्रमाणित करबाक छनि ने । तैं पुनः भाषणमे थुथुरलाजी झारए लगलाह– ‘विदेशी शक्ति केँ परास्त करए परत । अहाँसबकेँ बुझल अछि जे आइ काल्हि अपना ओइ ठाम पति पत्नीक झगडा होईछै, ताहूमे विदेशीक हाथ रहैत छैक । अहाँक नलमे पानि नै अबैए त’ बुझि लिय विदेशीक हाथ छै ।’
ज्ञानीबाबूक जोड़दार भाषण चलिए रहल छल कि सम्पूर्ण सभामे एक्कहि बेर ठहाका छूटलै । ओ चौँकि गेलाह । सभा दिस तकलनि– सब हुनके रिक्शा दिस आँगुर देखाक’ ठहाका मारि रहल छल । नजरि उठाक’ देखलनि । आश्चर्य ! रक्षक त’ ढ़नमनाईत हुनके रिक्शादिस आबि रहल छल । ई की ? क्षणभरिमे हुनक मस्तिष्क हजार प्रश्नसँ भरि गेलैक आ’ हुनका बुझएलै माथमे जेना सुनामी चलि आएल । ओ बेहोस भ’ धरामसँ निचा खसला ‘ठीक रक्षकके टांग नीचा आ’ रक्षक अपन कर्तव्य पूरा करए लागल । लोक ठहाका मारैत पानि ल’ क’ हुनका दिस दौड़ल ।

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