सवा ५ बजे स्नान ध्यान कऽ राम मन्दिरक महन्थ राम बाबा तैयार

भऽ जाइत छथि । श्रृंगार, आरती पूजा आ प्रसादी चढ़ावएके काज ओ स्वयं करैत छथि । जनकपुरधाम आबएवला पर्यटक वा यात्री जानकी मन्दिर आ राम मन्दिर दर्शनक लेल एबए करैत अछि । ई मन्दिरमे दर्शनार्थीक दिनभरि भीड़ लागल रहैत अछि, एकरबादो बाबाक चेहरापर कोनो थकान नहि रहैत छन्हि । हरेक समय प्रसन्नचीत ।
एकटा दार्शनिक कहने छथि – फूल कतबो सुन्दर हुए, प्रशंसा सुगन्धके होइत अछि, मनुष्य कतबो बड़का किए नहि हुए सम्मान हुनक गुणसँ होइत अछि । जनकपुरधामक कतेको मन्दिरक महन्थ लग दर्जनो विघा जमीन अछि । मुदा हिनका ओहि सभसँ मतलब नहि अछि । मात्र पूजा, भगवान प्रति समर्पित इएह गुण दोसरसँ हिनक अलग बनबैत अछि ।

 सुजीत कुमार झा
जनकपुरधामक प्रमुख धार्मिक स्थल राम मन्दिरमे जाइतए गेरुवा वा सम्तोला रंगक बस्त्र पहिरने एकटा बाबासँ भेट हएत । छोट खूटक ओ बाबाक आकर्षणसँ ओहिठाम पहुँचएवला किओ दूर नहि रहि सकैत छथि । ओ बाबा किओ दोसर नहि, ओ मन्दिरक महन्थ राम गिरि छथि ।
कखनो लोकक प्रसादी चढ़बैत रहैत छथि, कखनो आरती करैत रहैत छथि । जखनसँ मन्दिरक पट खुजत, बन्द नहि होबएधरि ओ मन्दिरेमे रहैत छथि । ‘मन्दिरक पट खुलल समय, अपन कक्षमे सेहो नहि बैसि सकैत छी,’ ओ कहैत छथि ।
राम गिरिसन समर्पित महन्थ जनकपुरधामक अन्य मन्दिरसभमे कमे भेटता । महन्थ मने मुखिया होइत छैक, छोटसँ छोट मन्दिरमे सेहो महन्थ आरती वा प्रसादीक काज नहि करैत छथि मुदा राम गिरि एहिसँ अलग छथि । ‘हमरो सहयोगी सभ अछि, जँ हम प्रसादी चढ़ावएवला काज नहि करब तइओ हेतैक मुदा मन्दिरसँ जुड़ल हरेक काज हम स्वयं करैत छी, एहिमे अलगे आनन्द होइछ’ ओ कहैत छथि । भोरक श्रृंगारमे मात्रे हिनका दू घण्टासँ बेसी समय लगैत अछि । चाह चर्चाक क्रममे ओ कहैत छथि, ‘दैनिक १० घण्टासँ बेसी मन्दिरक काज नहि करब तँ सन्तुष्टिए नहि हएत ।’
जनकपुरधामक कतेको मन्दिरक महन्थ लग दर्जनो विघा जमीन अछि । मुदा हिनका ओहि सभसँ मतलब नहि अछि । मात्र पूजा, भगवान प्रति समर्पित इएह गुण दोसरसँ हिनका अलग बनबैत अछि । ‘नहि किछु लऽ कऽ आएल छी आ नहि किछु लऽ कऽ जाएकेँ अछि तखन धन–धनक लेल किए चिन्तित रहु वा परेसान रहुँ,’ ओ बराबर कहैत रहैत छथि ।
चाह समान्यतया सीसा गिलास वा कप मे लोक पीबैत अछि मुदा राम बाबा पितरिया गिलासमे पीबैत छथि । दैनिक भोरमे दूबेर आ साँझमे दूबेर सहित चारि बेर ओ चाह पिबैत छथि । ‘हम तँ भोजन आ जलपान सेहो पितरिया थारी बाटीमे करैत छी,’ ओ कहैत छथि ।
भोजनमे भोरमे भात, दालि आ तरकारी आ रातिमे पुरी तरकारी खाएल करैत छथि । ‘जे मन्दिरमे चढ़ैत अछि (भगवानक भोग लगैत अछि) प्रायः उएह ग्रहण करैत छी, कहिओकाल कऽ चेलासभ सेहो भोजन बना कऽ अनैत छथि जाहिमे लहसुन प्याउज नहि रहैत अछि, ओ ग्रहण करैत छी,’ बाबा कहैत छथि ।
एखनधरि ई मन्दिरमे १२ गोटे महन्थ बनल छथि । पहिल महन्थक रुपमे चतुर्भुज गिरि, दोसर रेखा गिरि, तेसर अम्बर गिरि, चारिम अभिलाख गिरि, पाँचम बसन्त गिरि, छठम विश्वेश्वर गिरि, सातम ईश्वर गिरि, आठम रामलोचन गिरि, नवम रामानन्द गिरि, दशम विश्वनाथ गिरि, एगारहम अमर गिरि आ बारहम राम गिरि छथि । वर्तमानमे राम गिरिक नेतृत्वमे मन्दिर चलि रहल अछि ।
जानकी मन्दिरक निर्माणसँ पूर्व निर्मित ई मन्दिरक निर्माण प्यागोडा शैलीमे कएल गेल अछि । राम मन्दिरकँे देखलासँ काठमाण्डूक पशुपतिनाथ मन्दिरक झलक सेहो अबैत अछि । राम मन्दिरमे पंचायतन मूर्ति, लक्ष्मीनारायण, विष्णु दशावतारक मूर्ति, सातटा घोड़ायुक्त रथमे विराजमान सूर्य भगवान आ अन्य देवी देवताक नित्य पूजा अर्चना होइत आएल अछि । मन्दिरमे रहल मूर्तिसभ जनकपुरधामक सिद्ध सन्त चतुर्भुज गिरिकेँ भेटल छलन्हि । ओ बहुत बड़का सन्त रहथि । ओ भेटल मूर्तिसभकेँ मन्दिरमे रहल बरक गाछ लग राखि पूजा कएने इतिहास रहल अछि ।
शाहकालीन राजा रणबहादुर शाहक सेनापति अमरसिंह थापा वि.सं. १८३९ मे राम मन्दिरक निर्माण करौने छलाह । बादमे चन्द्र शम्शेर प्रधानमन्त्री भेल समयमे वि.सं. १९८४ मे पित्तलक छानामे सोनक पानि लगाओल गेल छल । जाहिसँ मन्दिरक आकर्षक बढ़ल । मन्दिरक लम्बाइ २५ फिट रहल अछि तहिना २३ फिट चौड़ाइ रहल अछि ।
राम मन्दिरक महन्थ कोनो सन्यासी होइत आएल परम्परा रहल अछि । सनातन धर्ममे जीवनक चारि भाग (आश्रम ) अछि । जाहिमे – ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम आ सन्यास आश्रम । सन्यास आश्रमक उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति अछि । सन्यास माने सांसारिक बन्धनसँ मुक्त हएब आ निस्वार्थ भावसँ भगवानकेँ निरन्तर स्मरण करब अछि । सन्यासकेँ शास्त्रमे जीवनक सर्वोच्च अवस्था मानल गेल अछि ।
सन्यास व्रत करएवलाकेँ सन्यासी कहल जाइत अछि । सन्यासीसभ एहि संसारमे रहैतकाल निर्लिप्त रहैत छथि अर्थात् ब्रह्मचिन्तनमे लीन भऽ भौतिक आवश्यकतासभ प्रति उदासीन रहैत छथि । हिन्दू धर्ममे सन्यासिन वा सन्यासिनीके पालना करएवला जीवनशैली वा आध्यात्मिक अनुशासन, विधि वा देवता कोनो औपचारिक माँग वा आवश्यकतासभ नहि अछि । ई व्यक्तिक छनोट आ प्राथमिकतासभमे छोड़ल जाइत अछि । ई स्वतन्त्रतासँ सन्यास ग्रहण करएवलाकेँे जीवनशैली आ लक्ष्यसभमे विविधता आ महत्वपूर्ण अन्तर अनने अछि ।
‘२५ वर्षक उमेरमे हम सन्यासीक दीक्षा भारतक प्रयागराजमे लेने छी, जाहि क्रममे पितृ पिण्डदान संगहि गृहस्थमार्ग त्यागने छलहुँ,’ राम गिरि कहैत छथि ।
बाबाक जन्म २०२८ साल बैशाखमे रामेछाप जिलाक कठजोड़मे भेल छल । माताक नाम भंगेरी अधिकारी आ पिताक नाम ईन्दूशंकर अधिकारी रहन्हि । जहिआ ३ महिनाक रहैत तहिए, हुनक नानी इन्द्रकला अधिकारीसंग माए हुनका लऽ कऽ जनकपुरधाम आएल छलीह । गुठी कार्यालयमे रहल एक कर्मचारी हिनक पिताक परिचित रहन्हि । उएह हिनक सभक रहएकेँ व्यवस्था एहिठाम कऽ देने छल । हिनक नानी आ माए सेहो सन्यासीक दीक्षा लेने रहथि ।
बच्चेसँ मन्दिरक सेवामे लागल रहैत छलथि । पढ़ाइक बात कएल जाए तँ शुरुमे झुलाघर विद्यालयमे फेर संकटमोचन माध्यमिक विद्यालयमे ई पढ़ने छथि । किछुए दिनक बाद पढ़ाइ ई छोडि़ देलन्हि । ‘हम मात्र ५ कक्षा पढ़ल छी, मन्दिरमे लागि गेलहुँ, एकरबाद विद्यालय जाएके अवसरे नहि भेटल,’ राम गिरि कहैत छथि ।
जनकपुरधामक महन्थ पद गुरु शिष्य परम्परा अनुसार चलैत आबि रहल अछि । मुदा बिना महन्थ गुरुएकेँ ई बनल छथि । अमर गिरि किनको चेला बनेने नहि रहथि । हुनक स्वर्गवास भेलाक बाद किछु दिन बिना महन्थकेँ मन्दिर चलल छल, बीचमे एक दू गोटेके महन्थ बना कऽ गुठी संस्थान पठेबो कएलक मुदा राम मन्दिर चलाएब सभक बसक बात नहि छल अन्त्यमे राम गिरिके महन्थ बनाओल गेलन्हि ।
एकटा दार्शनिक कहने छथि – बढि़या बात कहएसँ बेसी, बढि़या कर्म कऽ कऽ देखाउ । कारण लोक सुनए नहि, देखब बेसी पसिन करैत अछि । राम गिरि अपन काजसँ सभके प्रभावित कऽ लेलन्हि । जहिआ महन्थ नहि रहथि मन्दिरक सम्र्पूण काज करैत छलथि एखन छथिओ एकरबादो मन्दिरमे काज करएकेँ दैनिक कायमे छन्हि ।
‘हमरा महन्थ बनावएमे जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णवक महत्वर्पूण भूमिका रहल अछि । रामजानकी विवाह पञ्चमी महोत्सव भव्यरुपसँ मनाएब शुरु भेलैक । जानकी मन्दिर मिथिला दरवार आ राम मन्दिर अयोध्या दरवारक भूमिकामे आएल, एकरबाद जानकी मन्दिरक महन्थजी गुठी अधिकारीसभके कहि हमरा महन्थ बनवौलन्हि,’ ओ कहैत छथि । रामजानकीक विवाहमे दशरथजीक भूमिकामे राम गिरि रहैत छथि । वर्षभरि राम मन्दिर आ जानकी मन्दिरकेँ जोडि़ कऽ एहिठाम उत्सव होइत रहैत अछि ।
राम मन्दिरक महन्थ ककरा बनाएल जा ताहिपर जखन असंमजसता रहैक तहिओ ई बिचलित नहि भेल रहथि । चुपचाप अपन काजमे लागल रहलथि । एकटा दार्शनिक कहने छथि – जीवनमे कहिओ उदास नहि होइ, निराश नहि होइ । जीवन संघर्षमे चलैत रहत, कखनो जीबएके अन्दाज नहि खोएबाक चाही ।
दोसर दार्शनिक कहने छथि – मनुष्यके समय नहि एकर सही सदुपयोग सफल बनबैत अछि । महन्थ बनलाक बाद राम मन्दिरक संरक्षणमे ओ सदति लागल रहैत छथि । हिनके प्रयाससँ राम मन्दिर, जगमोहन आ हनुमान मन्दिरके पुर्ननिर्माण कएल गेल अछि । ‘जँ राम मन्दिरक पूर्ननिर्माण नहि कएल गेल रहैत तँ बड़का भूकम्प (२०७२ बैशाख १२ गते)मे मन्दिर ध्वस्त भऽ गेल रहैत । हम तँ मन्दिरमे छलहुँ पूरा मन्दिर झुलिरहल छल,’ ओ कहैत छथि ।
मानव सामाजिक प्राणी अछि । सामाजिक जीवनक अतिरिक्त मानवकेँ दोसर साथीक आवश्यकता पड़ैत अछि । ओ साथी अर्थात भगवान छथि । भगवान माने खास कऽ दूःखक निवारक छथि । हुनक नाम जे होइतहुँ परमात्मा माने सुखक हेतु होइत छथि ।
वैदिक सनातन हिन्दू धर्ममे भगवान कहलासँ एहि चराचर जगतक सृष्टि, स्थिति आ संहारकर्ता परब्रह्म परमात्माकेँ बुझल जाइत अछि । भग शब्दसँ परमात्माक अनन्त दिव्य गुणसभके बुझल जाइत अछि तँ वान शब्दसँ ओ अनन्त दिव्यगुणसभक धारक परमात्मा होइत छथि से संकेत करैत अछि । वैदिक प्रमाण अनुसार तेहन परमात्माक अनन्त नामसभ आ रूपसभ अछि से बात बुझल जाइत अछि । अनेक सिद्धान्तवादी तत्वद्रष्टासभ कहितो प्रेमी भक्तसभ ओ परमात्माके भगवान बेसी बुझैत छथि । अपन इष्टदेवकेँ ओ भगवान कहल करैत छथि । ताहिकारणेँ भगवान शब्द परमात्माक प्रेम परक स्वरूपक वाचक अछि से बात स्पष्ट होइत अछि ।
भगवान स्वयम् प्रकृतिक ५ तत्व (पञ्चतत्व)क संयोजनक एकटा संक्षिप्त रूप छथि । शाब्दिक अर्थमे कहल जाए तँ ‘भ’ क अर्थ भूमि (पृथ्वी), ‘ग’ क अर्थ गगन (अन्तरिक्ष वा आकाश), ‘वा’ क अर्थ वायु (हावा), ‘अ’ क अर्थ अग्नि (आगि) आ अन्तमे, ‘न’ क अर्थ नीर (जल वा पानि) होइत अछि । ई समग्र मिल कऽ भगवान बनल अछि । ‘भगवान’ शब्द वेदसभमे वा प्रारम्भिक वा मध्य उपनिषद्सभमे देखल नहि जाइत अछि । मुण्डाक उपनिषद्मे ‘भग’ शब्दक उपयोग रहल अछि, मुदा ‘भगवान’ शब्दक लेल नहि । ‘ईश्वर’ शब्दक प्रयोग ईशा वा शोपनिषद्क अतिरिक्त वैदिक शास्त्रमे वर्णित नहि अछि । देवतासभ आ देवी–देवतासभक प्रतिनिधित्व करए लेल श्रीराम, श्रीकृष्ण, विष्णु, शिव जेहन देवतासभक नामक उपयोग करैत, सभसँ पुरान संस्कृत ग्रन्थ एकटा अमूर्त ‘सर्वोच्च आत्मा’ आ ‘पूर्ण वास्तविकता’ क प्रतिनिधित्व करए लेल ब्राह्मण शब्दक उपयोग कएल जाइत अछि । ‘ईश्वर’ शब्द वेदसभ आ उपनिषद्सभमे देखल जाइत अछि, जतए एकर उपयोग आध्यात्मिक अवधारणासभमे चर्चा करए हेतु कएल जाइत अछि ।
भगवान शब्द बादमे वैदिक शास्त्र जेहन– श्रीमद्भागवद् गीता आ पुराणमे पाओल जाइत अछि । भक्ति स्कूल साहित्यमे, ई शब्द साधारणतया कोनो देवताक लेल उपयोग कएल जाइत अछि, जकरा लेल प्रार्थना कएल जाइत अछि, उदाहरणक लेल श्रीराम, गणेश, श्रीकृष्ण, ब्रह्मा, शिव वा विष्णु । विशेष रुपसँ देवता, प्रायः भक्तक आ मात्र भगवानक होइत अछि । भगवान भक्ति परम्परासभमे पुरुष छथि आ भगवानक स्त्री समकक्ष भगवती छथि । किछु हिन्दुसभक लेल भगवान शब्द भगवानक एकटा अमूर्त, लिङ्गरहित अवधारणा अछि ।
धर्म÷कर्म आ पूजापाठ कएलासँ ईश्वर प्राप्त होइत अछि, जे इच्छा रखैत छी ओ प्राप्त होइत अछि, भय, डर त्राससँ मुक्त होइत छी से धार्मिक विश्वास हमरासभ भीतर अछि । इएह मान्यतासँ अनुशासन आ सामाजिक परिधि निर्माण सेहो भेल अछि । एहि अर्थमे धर्म समाजकेँ एकटा निश्चित परिधिसँ बाहर जाएसँ रोकएके नियन्त्रणक साधन सेहो बनल अछि । इएह कारण अछि जे लोक कोनो गलत काज कएलापर कानुनसँ नहि डेराइतो धर्मसँ किछु नहि किछु भयभित अवश्य होइत अछि ।
महन्थ वापत राम गिरिकेँ १० हजार ८ सय रुपैया महिनाक तलब भेटैत अछि । कार्यालय सहायकसँ सेहो कम, एकरबादो हिनका कोनो दुःख नहि अछि । ई राम आ राजदेवी मन्दिर दुनू देखैत छथि । जाहि घरमे ई रहि रहल छथि, ओहिमे २५ वर्षसँ बेसी समयसँ । ओ घरमे गेलाक बाद कबाड़ाखाना जकाँ देखाइत अछि, एकरबादो हिनका कोनो दुःख नहि अछि आ नहि ककरोसँ सिकाइत ।
धन्य मानी राम युवा कमिटीक पूर्व अध्यक्ष प्रमोद चौधरीक । ओ समन्वय कऽ मन्दिरक भीतरे एकटा सुविधा सम्पन्न घर बनवा रहल छथि । जाहिमे पुरातत्व विभाग, गुठी संस्थान, जनकपुरधाम उपमहानगरपालिका, वृहतर जनकपुर, राम युवा कमिटी, महावीर युवा कमिटी सहयोग कऽ रहल अछि । किछुए दिनमे नव भवनमे हिनक बास हएत ।
सवा ५ बजे स्नान ध्यान कऽ बाबा तैयार भऽ जाइत छथि । श्रृंगार, आरती पूजा आ प्रसादी चढ़ावएके काज ओ स्वयं करैत छथि । जनकपुरधाम आबएवला पर्यटक वा यात्री जानकी मन्दिर आ राम मन्दिर दर्शनक लेल एबए करैत अछि । ई मन्दिरमे दर्शनार्थीक दिनभरि भीड़ लागल रहैत अछि, एकरबादो बाबाक चेहरापर कोनो थकान नहि रहैत छन्हि । हरेक समय प्रसन्नचीत ।
एकटा दार्शनिक कहने छथि – फूल कतबो सुन्दर हुए, प्रशंसा सुगन्धके होइत अछि, मनुष्य कतबो बड़का किए नहि हुए, सम्मान हुनक गुणसँ होइत अछि ।
नदी जखन निकलैत अछि, पहिनहिसँ कोनो नक्शा नहि रहैत अछि । बिना नक्शाके सागरधरि पहुँच जाइत अछि । एना नहि अछि, नदी किछु नहि करैत अछि ओकरा सागरधरि पहुँचए लेल लगातार बहब अर्थात कर्म करए पड़ैत अछि । एकर सन्देश अछि – कर्म करैत रही, नक्शा तँ भगवान पहिनेसँ बना कऽ बैसल छथि, हमरा तँ मात्र बहबाक अछि । बहबएमे कन्जुस्याइ नहि होएबाक चाही ।
मार्सल कलाकार बू्रस ली कहने छथि – जीवनक लड़ाइमे तेज व्यक्ति वा शक्तिशाली मात्र जीतैत छथि तेहन नहि होइत अछि, जीतैत ओ अछि जे ई सौचैत अछि ओ जीत सकैत छथि । सोच सेहो विजयीके द्योतक होइछ ।
राम बाबासंग करिब–करिब एहने स्थिति भेल अछि । एकटा पहाडसँ आएल गरीब ब्राह्मण एतेक बड़का मन्दिरक मुखिया भऽ गेला । ‘हम कर्म करैत छी, फल देवएवला उपर बैसल छथि तँए हम इम्हर उम्हर तकबो नहि करैत छी, सीधा अपन काजमे लागल रहैत छी,’ ओ कहैत छथि । जहिआसँ महन्थ बनल छथि, ओ काठमाण्डूधरि नहि गेलथि अछि । बनारसमे विश्वनाथ मन्दिरक कोरिडोरक रुपमे चारुकात बहुत सुन्दर बनाओल गेलैक अछि, अयोध्यामे रामललाक भव्य मन्दिर बनिरहल छैक बहुतोकेँ मुँहसँ सुनि रहल छथि । मुदा ओ कहैत छथि, ‘हमरा लेल विश्वनाथ, रामलला, पशुपतिनाथसभ राम मन्दिरेमे अछि ।’
ओ आदर्श प्रेरित छथि । विश्वास आ भरोसा समाप्तवला समयमे सेहो ई एकटा उदाहरणीय छथि । एकटा दार्शनिक कहने छथि – फूलक सुगन्ध मात्र हावाक दिशामे पसरैत अछि, मुदा बढि़या व्यक्तिकेँ बढि़यापन हरेक दिशामे पसरैत अछि । हिनक व्यक्तित्वसँ प्रभावित भेने लोक नहि रहि सकैत अछि । सहजता हिनक सुगन्ध अछि ।
स जीवति गुणा यस्य धर्मो यस्य जीवति
गुणधर्मविहीनो यो निष्फलं तस्य जीवितम् ।।
एकर अर्थ अछि – जे गुणवान छथि, धार्मिक छथि उएह जीबैत छथि वा कही जीब रहल कहल जाइत अछि । जे गुण आ धर्मसँ रहित छथि हुनक जीवन निष्फल अछि ।

लेखक बारे