मैथिली कथा – व्यर्थक उड़ान

Byदूधमती साप्ताहिक

१६ मंसिर २०८०, शनिबार १५:५९ १६ मंसिर २०८०, शनिबार १५:५९ १६ मंसिर २०८०, शनिबार १५:५९

 सुजीत कुमार झा

रबिदिन दिनभरि ममता अपन पतिकेँ प्रतीक्षा करैत रहलीह । घरक मुख्य द्वारपर कनिको आहट होइत छल हुनक अनुहार स्वयं बाहर दिस उठि जाइत छल । एक बेर तऽ हुनका लागल जेना केओ गेटपर ठाढ़ होइक । आश भरल मोनसँ ओ गेट खोललीह । देखलैन्हि एकटा बिलारि गेटसँ भितर पैसबाक व्यर्थ प्रयास कऽ रहल छल, जकर कारण खट–खटकेँ आबाज आबि रहल छल । किछुए देरमे ओ निराश भऽ घूरि घरमे चलि अएलीह ।
बितल बृहस्पतिदिन हुनकर पति विराटनगर गेल छलाह । ओहि दिन अचानक हुनका अपन केन्द्रीय कार्यालयक महाप्रबन्धकसँ विराटनगर जएबाक आदेश प्राप्त भेल छल । किछु गोपनीय कागज लऽकऽ साँझधरि ओतऽ पहुँचाबाक छलै । तँए ओ भोरे बस पकडि़ लेने छलैथि । ममताकेँ कहिकऽ गेल रहैथि एक–दू दिनक काज अछि शनिदिनधरि कोनो हालतमे जनकपुर चलि आएब ।
शनिदिन साँझधरि ममताके बेसी मतलब नहि छल मुदा जखन रविदिन साँझधरि सेहो हुनकर पति घूरिकऽ नहि आएलैन्हि तऽ हुनका चिन्ता सताबऽ लागल छल । हुनका लागल जेना हुनका घरसँ गेला महिनो बित गेल हुअए, जखन अबेर रातिधरि नहि अएलैन्हि तऽ हुनकर मनमे खराब–खराब बात सभ आबऽ लागल छल । ओ सुतबाक असफल प्रयास करऽ लगलीह । कखनो एक दिस करोट फेरैथि तऽ कखनो दोसर दिस, मुदा निन्न जेना कोसो दूर छल ।
‘कतऽ रुकि सकैछथि ओ’, ममता सोचऽ लगलीह, ‘कतहु गाड़ी नहि छूटि गेल हुअए ।’ यदि गाडी छूटि गेल रहितै तऽ दोसर गाड़ी सेहो पकडि़ सकैत छलैथि । काल्हि नहि आबि सकलैथि, आइ तऽ आएल रहितैथि ।
भऽ सकैत अछि हुनकर जेबी कटागेल हुअए आ संगमे पैसा नइँ होइक । एहनमे बहुत मोश्किल भऽ गेल होइक आ घुरबाक टिकट लेबऽ लेल हुनका बिकट समस्या भऽ गेल हएतैक ।
मुदा, दोसरे क्षण ममता ओकर समाधान खोजऽ लगलीह, एहनमे कतेको उपाय भऽ सकैत अछि जेना ओतऽ स्थित अपन कार्यालयक शाखा अधिकारीकेँ अपन समस्या बता कऽ पैसा उधार माँगि सकैत छलैथि । ओतऽकेँ शाखा अधिकारी जनकपुरेसँ बदली भऽ कऽ गेल छथि आ हुनकर बढियाँ मित्र सेहो छथि । हँ हुनका हाथमे घड़ी सेहो बान्हल अछि ओकरा बेच सेहो सकैत छथि । नहि, हुनकर जेबी नहि कटल हएत । एखनधरि नहि अएबाक कारण कोनो दोसर हएत ।
भऽ सकैत अछि बस स्टैण्डपर हुनकर समान चोरी भऽ गेल हुअए । तखन तऽ ओ बडी समस्यामे फँसि गेल हएता । हुनकर बैगमे तऽ अफिसक बहुत महत्वपूर्ण कागज–पत्र छल । यदि एना भेल तऽ अनर्थ भऽ जाएत फेर तऽ हुनका नोकरीसँ निकालि देल जाएत । अपन नोकरी बचएबाक लेल अधिकारी सभक आगा कहँु गिरगिराए नहि परैन्हि । केहन भयाबह स्थिति हएत ओ ?
ई सोचि कऽ ममताक आँखिक आगा कतेको प्रकारक भयानक दृश्य घुमऽ लागल ।
नोकरी छूटि गेल तऽ द्वारे–द्वारे भटकऽ नहि पड़ैन्हि । आइ काल्हि जल्दी नोकरी कहाँ भेटैत अछि ? हरेक महिना भेटऽ बला महिनबारी बन्द भऽ जाएत, ओहि बिना कोना दिन चलत ? घरक भाड़ा कतऽसँ देब । बच्चाक फिस, किताब, घरक अन्य खर्च कतऽसँ चलाएब । सभ किछु कटा कऽ दू–तीन हजार रुपैया मात्र बचैत अछि बाद बाँकी सभ घरेमे खर्च भऽ जाइत अछि । मुदा यदि इहो पैसा भेटब बन्द भऽ जाएत तऽ कतयसँ करब सभ खर्च ?
यदि एहन स्थिति आबि गेल तऽ कोनो अन्य उपाय खोजहे पड़त …. हँ, अपन नैहरसँ किछु मदति लेबऽ सकै छी । आखिर ओहो सभ कतेक दिन हमर सहायता करत ? बाबुजी, माँ , भइया, भौजी आ हुनका सभक छोट–छोट बच्चा ….. हुनकर सेहो भड़ल–पूड़ल परिवार अछि । हुनका सभकेँ अपनो तऽ बहुत खर्च अछि । अन्तत्वोगत्वा हुनकेँ स्वयं किछु–किछु अपन आम्दनीक लेल उपाय खोजऽ पड़त ।
ममताकेँ एकटा उपाय सूझल, ‘अपन बाबुजीसँ कहि सूनिकऽ कोनो छोटका–मोटका दोकान खोलबा लेब ।’ कतेक कष्टदायक दिन हएत ओ, की हमरा दोसरक सहारापर जीबाक स्थिति तऽ नहि चलि आएत ?
ममता सोचति–सोचति एक बेर फेरसँ वर्तमानमे घूमि अएलीह । दुनू बच्चा ओछाएनपर हरेक बातसँ बेखबर निन्नमे सूति रहल छल । ओ पुनः सोचऽ लगलीह, ओ स्वयं एकटा बच्चा रहितैथि ।
बाहर अन्हार छल । दूरसँ कतहु कुकुर भुकबाक आबाज रातिक शान्तिकेँ चीरि रहल छल । ओ अनुमान लगाओलैन्हि रातिके १२ बाजि गेल अछि ओ माथके झटका दैत, हम तऽ नहि जानि की–की सोचऽ लगैत छी । बाहर जाएबला कोनो कारणसँ बेसी दिन सेहो रहि सकैत अछि ।
ममता अपन मनके समझाबैत कएलीह । दुश्चिन्ता हुनक पाछा नहि छोडि़ रहल छल । नहि चाहितो हुनका रंग–बिरंगक बात सभ मोनमे आबि रहल छल । ‘नहि, हुनकर समान चोरी नहि भेल अछि । तऽ फेर एखनधरि घुरलाह किए नहि । काल्हि तऽ हुनका अवश्य आबि जएबाक चाहियैन्हि आ तखन ममताके पतिपर रहि–रहिकऽ तामस आबऽ लागल, ‘यदि बेसी दिन लागऽबला छलै तऽ कमसँ कम अगल–बगलमे रहल टेलिफोनसँ सूचना तऽ दऽ सकैत छलाह ।’ आबि जाउथ एकबेर खुब खबरि लेबैन्हि । अएता तऽ केबारे नहि खोलबैन्हि । मुदा केबार तऽ खोलहे पड़त । हम हुनकासँ बाते नहि करब बरु ओहिके लेल ओ जतेक मनओता, खुब तंग करब । चाहोधरिकँे लेल नहि पुछब, ओ बुभैmत छथि की अपनाके ? पता नहि श्रीमान ओतऽ कोन गुलछर्रा उड़ा रहल हएताह । हुनका कि पता हएत एतय जे हुनकर चिन्तामे केओ दिन–राति परेशान अछि ।
किछुए क्षणमे हुनका कोनो अज्ञात भय घेर लेलक, कतहुँ ओ कोनो महिला–तहिलाके चक्करमे तऽ नहि पडि़ गेल छथि । आइ–काल्हि बड़का–बड़का शहरमे कतेको पेशेवर महिला नव–युवककेँ फँसाबऽके चक्करमे रहैत अछि । अवश्य अहिना भेल हएत । हुनका फँसाकऽ सभ किछु लूटि लेने हएत । मुदा एना नहि भऽ सकैत अछि, ओ असानीसँ ककरो चँगुलमे फँसऽ बला नहि छथि । अवश्य कोनो अन्य कारण हएत । ममताके मन–मस्तिष्कमे अजिब तर्क–वितर्क चलि रहल छल ।
एहन कोन कारण भऽ सकैत अछि जे ओ एखनधरि नहि घुरलाह अछि । कतहु कोनो दुर्घटना–तुर्घटना तऽ नहि भेल अछि ? नहि, नहि …. ममता एक बेर भितरधरि काँपि उठलीह ।
रिक्सासँ बस स्टैण्डधरि अबैत समय कोनो दुर्घटना …… नहि , नहि ….. बस दुर्घटना भऽ गेल हएत, यदि चोट लागल हएत तऽ कोनो अस्पतालमे पड़ल कुहरि रहल हएताह …. नहि, नहि हुनका किछु नहि भेल हएतैन्हि ।
ममता मने–मन पतिके कुशलताक कामना करऽ लगलीह ।
यदि एहन दुर्घटना भेल रहितै तऽ पत्रिका, रेडियो वा टेलिभिजनपर खबर आबि जाइत ।
ममता ओछाएनपरसँ उठि अलमारीमेसँ बितल तीन–चारिदिनके समाचार–पत्र खोजिकऽ लऽ अनलीह । ओ पत्रिकाक पन्ना उल्टा–पल्टाकऽ एक–एकटा समाचार ताकऽ लगलीह । विराटनगरक कोनो दुर्घटनाक खबरि नहि छल ।
‘ई कि उल्टा–सिधा सोचऽ लगलहुँ, कतेक मूर्ख छी हम,’ ममता अपने–आपकेँ चिन्ताके भँवरसँ मुक्त करबाक कोशिस कएलीह । मुदा हुनकर व्याकुल मोन हुनका घेर–घाइरकऽ फेर ओतहि आनि लैत छल ।
हुनका लगैत छल जेना हुनकर पति अस्पतालमे पड़ल मृत्युक आगा ठाढ़ छैन्हि ।
ओतऽ तऽ हुनका देखोभाल करऽबला केओ नहि हएतैन्हि ।
बेहोशीके हालतिमे ओ अपन अता–पता सेहो नहि कहि पाएल हएता । कतहुँ ओ ओतहि दम तोडि़ नहि देने होइथ । नहि, नहि हुनकर वे–वारिश लाश….ई सोचिकऽ भितरधरि सिहरि उठली । हुनका बुझाएल हुनकर आँखि भिजगेल हुअए आ नोरक बुन्द हुनकर गालपर टघरि आएल हुअए । अपन नादानीपर सोचिकऽ हुनका हँसीओ आएल आ तामसो ।
ई हमरा की होइत जा रहल अछि ? जागलोमे केहन–केहन सपना देखि रहल छी । ममता कल्पनाक आँखिसँ देखि रहल छलीह, की किछु व्यक्ति हुनकर पतिक लाशकेँ गाडीपर लादि कऽ अनने अछि ? घरपर भीड़ जमा भऽ गेल अछि । चारु दिस लोक कानि रहल अछि । लोक हुनकासँ साहनुभूति दऽ रहल अछि । ओ एक बेर फेर ओ विचारकेँ अपन दुखी मोनसँ झटैक देबऽ चाहलीह मुदा, विचारक उड़ानपर ककर बस चलैत अछि ।
‘हुनका मरलाक बाद हमरा की हएत ? हुनकर अभावमे ई पहाड़ सन जीवन कोना कटत,’ ममताक विचारक श्रृंखला लम्बा भऽ रहल छल । ‘नहि, नहि एना नहि भऽ सकैत अछि । एनामे दोसर विवाह …..नहि, नहि, ककरासँ विवाह करब ? एहि उमेरमेके पकड़त हमर हाथ ? की कोनो व्यक्ति हुनकर दुनू बच्चाकेँ अपनाबऽ लेल तैयार हएत ? के करत ओतेक त्याग ? हम एतेक बुढ़ तऽ नहि भऽ गेल छी जे केओ हमरा पसिन नहि करत ? २६ वर्ष उमेरे की होइत अछि ? दूटा बच्चाकेँ जन्म देलाक बादो हम सुन्दर आ जुआन लगिते छी । ओहि दिन मलंगवा बाली अण्टी कहि रहल छलीह, ‘ ममता लगैत नहि अछि जे अहाँ दूटा बच्चाकेँ माय छी । यदि संगमे दूटा बच्चा आ माथमे सिन्दुर नहि रहैत तऽ केओ कहि नहि सकत अहाँ विवाहित छी ।’
फेर एकाएक ममताकेँ कमलजी स्मरण आबि गेल, कमल अविवाहित छथि । ‘कतेको वेर हम कमलकेँ कनडेढि़ए आँखिसँ अपना दिस तकैत देखने छी । ओ सदिखन हमर बनाएल भोजनकेँ प्रशंसा करैत रहैत छथि ।’ हमरा स्वयं सेहो कमल बहुत नीक लगैत छथि । कमल स्मार्ट छथि, सभ्य छथि । ओ घरपर अबैत जाइत रहैत छथि । हम ककरो माध्यमसँ हुनकर हृदयकेँ टोहऽकँे प्रयास करब । यदि ओ माइन गेला तऽ हुनका संग हमर जीवन खुब सुखमय रहत । ओ हुनकासँ उच्च पदपर सेहो छथि । आय सेहो बढि़याँ होइत छैन्हि । हुनका लग दूमहला घर छैन्हि, गाड़ी किनबाक बात सेहो किछुए दिन पूर्वकऽ रहल छलैथि । ओ अवश्य हमरासँ विवाह कऽ लेताह,’ ममता अनायासे मोने–मोन स्वयंकेँ कमल संग जोड़ऽ लगलीह ।
‘हम कमलक संग हनिमून मनाबऽ सेहो जाएब । ओ हमरा पोखरा लऽ जएताह । हम पोखरा कहियो गेलो नहि छी । कतेक बेर हुनका संग अनुरोधो कएने छलहुँ, कहियो पोखरा घुमाउ, मुदा ओ हरेक समय टालैत रहैत छलैथि, मुदा धीया–पुता ? ओकरा सभकेँ नाना नानी लग छोडि़ आएब ।’
कमलके संग प्रेम क्रीडा, हास–परिहास इत्यादी क्षणभरिमे ममता कतेको अनर्गल बात सोचऽ लगलीह ।
पोखराक काल्पनिक दृश्य, फोटोमे देखल ताल, नाउ इत्यादि बात सोचिकऽ हुनकर मोन रोमाञ्चित भऽ उठल ।
एका एक हुनकर तान्द्रा भंग भेल । बाहर गेटपर केओ खटखटा रहल छल । ममता कल्पनाक संसारसँ मुक्त भऽ एका–एक वास्तविक धरातलपर चलि अएलीह । अपन उट–पटाङ्ग विचारके स्मरणकऽ ग्लानीसँ भरि उठलीह, ‘ कतेक निम्न स्तरक विचार अछि हमर ? हम कतेक खसि गेल छी ? की एतबे पतिव्रता छी हम ? ’ ममताकेँ लागल जेना एखने कोनो ओ भंयकर सपना देखने होइथ । बाहर केओ एखनो गेट खटखटा रहल छल । ‘एतेक राति बीतल, के भऽ सकैत अछि ?’ ममता सोचिते उठलीह आ गेट जोड़सँ खोललीह, देखलैन्हि हुनकर पति बैग हाथमे लेने आगा ठाढ़ मुिस्कया रहल छलाह । ओ दौड़कऽ हुनकासँ लेपटा गेलीह । प्रशन्नताक कारण हुनकर आँखिसँ नोरक धारा बहऽ लागल ।

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