मैथिली कविताः घर सोझाके अशोक गाछ

Byदूधमती साप्ताहिक

१४ असार २०७७, आईतवार ११:५२ १४ असार २०७७, आईतवार ११:५२ १४ असार २०७७, आईतवार ११:५२ , ,

 

– चन्द्रकिशोर
कहियो सुसकैय
कहियो घेघिआईय
शब्द गुमसुम परल रहैय
जस के तस
लेकिन पुरान बाकस जकां
बचैले हय अशोक गाछ
घर – आंगन छोडके गेलहा के पदचाप !

केबाडी में लागल बड़का ताला
एहिना लटकल रहतै
जे एकबेर लटक गेल / हमेशा एहिना होइत रहतै
कि अशोक गाछ ! पुछियो न सकैय
कहां चल जाईछा ?
जिनगी के बैलगाड़ी केना बढैत हौअ ?
पैडां के खरौरी सभ केना कतिअयला ?

कहियोकाल अशोक गाछ
अपन बात ओहिना कहैय
जेना मेघ के बुन्नी झहरके कहैय ।
कि गाछ अशोक
अपन बात कह पबैय ?
कतेक लोग बरसैत मेघ के बोली बुझैय ?
कतेक लोग झहरैत ओस के गति पकडैय ?
या जे पटरी रेल से बुदबुदाईअ से सुन पबैय ?
या हावा खिड़की से फुसफुसाईअ से गुन सकैय ?

अशोक गाछ
हाथमे डिबिया लेके अगोरले हय
प्रतिक्षाके चौखट पर
कब लौटत ऊ लोग खोंतामे ।
गाछके,सब इयाद हय
केना एक एक पैर निकलल
आ अंतमे ताला लाग गेल

कहां बिसरल हय बहरल लोगसब
जब केकरो मुंहसे निकलैय” अशोक गाछ”
शब्द ओहिठम अटक जाईए
अशोक गाछ शब्दसे जे यात्रा शुरू होइअ
ऊ यात्रा ओहिठम हो जाईअ सम्पूर्ण
आई कोनो बाल्मिकी नहय खड़ा
जे लिखत अशोक गाछ के निचा छुपल महाकाव्य !

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